उम्मीद पर कायम हैं पड़ोसी

पुष्परंजन ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक नार्वेजियन पीस कमेटी के सेक्रेटरी गेर लुंडेस्टाड से कोई यह सवाल पूछे कि क्या वह अगला नोबेल शांति पुरस्कार नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ को दिया जाना पसंद करेंगे? पक्की बात है कि वह इसका जवाब टाल जायेंगे. गेर लुंडेस्टाड पत्रकारों से गुफ्तगू पसंद करते हैं, लेकिन शांति […]

पुष्परंजन
ईयू-एशिया न्यूज के नयी दिल्ली संपादक
नार्वेजियन पीस कमेटी के सेक्रेटरी गेर लुंडेस्टाड से कोई यह सवाल पूछे कि क्या वह अगला नोबेल शांति पुरस्कार नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ को दिया जाना पसंद करेंगे? पक्की बात है कि वह इसका जवाब टाल जायेंगे.
गेर लुंडेस्टाड पत्रकारों से गुफ्तगू पसंद करते हैं, लेकिन शांति पुरस्कार किसे देना है, ऐसे सवालों पर उनकी मुðट्ठी हमेशा बंद रहती है. ऐसा निजी अनुभव जून 2004 में ओस्लो स्थित उनके कार्यालय में मुलाकात के दौरान मुझे हुआ था. गेर लुंडेस्टाड अब भी बदले नहीं हैं. फिर भी दुनिया उम्मीद पर कायम है. और यह उम्मीद उसके बाद बढ़ जाती है, जब कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को साझे रूप से नाेबेल शांति पुरस्कार दिया जाता है.
1994 में यासिर अराफात, शिमोन पेरेज और इशाक राॅबिन को इकðट्ठे नाेबेल शांति पुरस्कार दिया गया, तो दुनिया चौंकी नहीं थी. उससे एक साल पहले 13 सितंबर, 1993 को ओस्लो में ही इजराइल और फिलस्तीन ने अमन के लिए समझौता किया था. अलग बात है कि दो दशक के बाद भी बंदूकों से गोलियां बरसनी रुकी नहीं हैं.
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सरप्राइज कूटनीति’ से अपने समर्थकों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं. हालांकि मोदी-समर्थक मानने को तैयार नहीं हैं कि ऐसी ‘सरप्राइज डिप्लोमेसी’ के मार्ग में कश्मीर मसला से लेकर सर क्रीक और आतंकवाद तक खड़ा है.
जमात-ए-इसलामी जैसी पार्टी को समझाने की मुश्किल यदि नवाज शरीफ के सामने दरपेश है, तो ऐसी कठिनाई मोदी सरकार में साझीदार शिवसेना के सवालों के उत्तर देने में भी आ रही है. 15 जनवरी, 2016 को भारत-पाक विदेश सचिवों की बैठक के दौरान पता चलेगा कि हुर्रियत को दोनों पक्ष कैसे हैंडल करते हैं.
मोदी की लाहौर यात्रा से एक संदेश तो गया है कि 2016 में इस्लामाबाद में होनेवाली दक्षेस बैठक में माहौल मित्रवत रहेगा. वहां काठमांडो की कथा दोहराई नहीं जायेगी, जिसमें बाकी छह शासनाध्यक्षों की ऊर्जा मोदी और शरीफ को मनाने में नष्ट हो गयी थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की पहली विदेश यात्रा थिंपू की हुई, तो आज भी भूटान रिश्तों की गहराई को निभा रहा है.नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और मालदीव कूटनीतिक तल्खी और अनबन के सबसे बड़े उदाहरण बने हुए थे.
इनमें से श्रीलंका और पाकिस्तान से संबंध सहज करने के मार्ग को मोदी ने ढूंढ़ लिया है. 15 मार्च, 2015 को प्रधानमंत्री मोदी को माले जाना था. लेकिन, उन्होंने मालदीव की यात्रा रद्द कर दी. मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद की गिरफ्तारी इसकी वजह थी, मगर इसका उल्लेख आधिकारिक तौर पर नहीं किया गया. 2016 में इस्लामाबाद दक्षेस शिखर बैठक से पहले प्रधानमंत्री मोदी को माले से रिश्ते बेहतर करने होंगे.
म्यांमार में आंग सान सूची की पार्टी ‘एनएलडी’ को सैनिक शासक सत्ता हस्तांतरित कर रहे हैं. आम चुनाव से छह माह पहले, सूची जून 2015 में चीन गयी थीं, जहां प्रोटोकाॅल से हट कर शी चिनफिंग ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया था. चीन के व्यावसायिक और सामरिक हित म्यांमार से लगातार मजबूत होते रहे हैं.
2014 तक चीन, म्यांमार में 14 अरब डाॅलर का प्रत्यक्ष पूंजी निवेश कर चुका था. चीन-म्यांमार व्यापार सात अरब डाॅलर को पार कर चुका है. दूसरी ओर भारत-म्यांमार के बीच 2015 में तीन अरब डाॅलर के व्यापार का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है. बल्कि थाईलैंड, भारत से कई गुना अधिक व्यापार म्यांमार से कर रहा है.
मलक्का जलडमरूमध्य के बरास्ते ऊर्जा आयात की निर्भरता कम करने के वास्ते चीन ने हाल में म्यांमार के क्याकप्यू से कनमिंग तक तेल और गैस पाइपलाइन का विस्तार किया है. ऐसा भारत क्यों नहीं कर सकता था? इसके बरक्स भाजपा के प्रवक्ता इस वीरगाथा को कहते नहीं अघाते कि म्यांमार में घुस कर हमने आतंकियों को मार गिराया है.
2016 में म्यांमार की एनएलडी सरकार से नयी दिल्ली के क्या एजेंडे तय होने हैं, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियों में बांग्लादेश समझौता, नयी दिल्ली में ‘अफ्रीकी फोरम’ की बैठक को गिना सकते हैं.
7 मई, 2015 को भू-सीमा समझौता (एलबीए) संसद में पास हो जाने के बाद, 68 साल पुराने विवाद के समाधान के साथ मोदी, ममता बैनर्जी के साथ बांग्लादेश गये थे. इसे भारतीय कूटनीति की ‘सक्सेस स्टोरी’ कहेंगे. 7 दिसंबर, 2015 को भारतीय संसद के शीतकालीन सत्र में नेपाल को लेकर गरमा-गरम बहस हुई. अधिकांश सांसदों की राय थी कि विदेश सचिव एस जयशंकर को प्रधानमंत्री का विशेष दूत बन कर नेपाल को नसीहत देने काठमांडो नहीं जाना चाहिए था.
फिर दूसरी राय यह बनी कि नेपाल को समझाने के वास्ते भारतीय नेताओं का शिष्टमंडल जाये. यदि ऐसा होता है, तो भावुकता में हम बहुत बड़ी कूटनीतिक भूल करने जा रहे हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि नेपाल के साथ ‘छोटा भाई-बड़ा भाई’ जैसा सुलूक के दिन लद गये. एक संप्रभुता संपन्न देश की कठिनाइयों को सुलझाने के वास्ते ‘कूटनीतिक आॅपरेशन’ की आवश्यकता है.
नेपाली संविधान में संशोधन का फाॅर्मूला लगभग तय हो चुका है. मगर, 26 दिसंबर को विराटनगर में बंदी के दौरान मधेसी नेता राजेंद्र महतो की बुरी तरह पिटाई ने स्थिति बिगाड़ दी है.
फिर भी यदि नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली, उनके रणनीतिकार प्रचंड, मधेस समस्या सुलझाने में विफल होते हैं, तो उन्हें ठीकरा फोड़ने का मौका नहीं दिया जाना चाहिए कि भारत के कारण सत्यानाश हो गया. रविवार को संयुक्त लोकतांत्रिक मधेसी मोर्चा ने सिंह दरबार में बैठक के दौरान संकेत दिया कि नाकेबंदी हटायेंगे. दूसरी ओर परराष्ट्र मंत्री कमल थापा लगातार उस खेल में लगे हुए हैं, जो कभी दरबार की ओर से खेला जाता था.
भारत पर दबाव के लिए नेपाली नेता गाहे-बगाहे चीन की गोद में बैठ जाने की धमकी देते रहे हैं. इसी योजना के तहत कमल थापा पांच दिनों की यात्रा पर पेइचिंग में हैं. चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ साझा प्रेस काॅन्फ्रेंस कर द्विपक्षीय समझौते के बारे में घोषणा हुई कि चीनी नागरिकों को नेपाल आने के लिए वीजा की आवश्यकता नहीं होगी. पारगमन के वास्ते आधे दर्जन ‘ट्रांजिट प्वाइंट’ खोले जायेंगे. खासा-काठमांडो ‘अरनिको राजमार्ग’ को दुरुस्त किये जाने के लिए 14 करोड़ डाॅलर आवंटित किया गया है. चीन-नेपाल संबंध के साठ साल पूरे हो रहे हैं.
प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पहले दिल्ली जाते हैं, या पेइचिंग, इससे भी उनकी नीयत साफ हो जायेगी. सबसे अखरनेवाली बात नेपाल पर प्रधानमंत्री मोदी की चुप्पी है. अपने समकक्ष केपी शर्मा ओली से मोदी जी को मन की बात कर लेनी चाहिए!

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