गिरींद्र नाथ झा
किसान एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार
यह साल भी अब विगत होनेवाला है, बस एक दिन बाकी है, फिर तो सब कुछ नया हो जायेगा. नया होना सबसे बड़ा भरम है. दरअसल, हम सब इसी भरम में जिंदगी काट देते हैं.
वैसे यह भी सच है कि खुश रहने के लिए यह भरम बना भी रहना चाहिए. साल 2015 की यादों को लिये हम नये साल में कदम रखनेवाले हैं, ऐसे में मेरे जैसा किसान यादों की पोटली लिये हाजिर है, जिसमें सुख भी है और दुख भी. लहलहाती फसलों की दास्तां भी है, तो आंधी-तूफान से मार खाये मक्का की कहानी भी है. इन सबके साथ इस साल की बात करते हुए मन के भीतर ढेर सारी कहानी चल रही है, नदी की तरह, कबीर की वाणी की तरह- ‘कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर’.
वैसे इस साल मक्का, आलू और अन्य फसलों के संग हमने खूब बातें की. मक्का को बेटा मान लिया तो धान को बेटी. इन दोनों के साथ जीवन की गाड़ी चलाने लगे. मक्का हर साल कुछ न कुछ देते आया है. जिस खेत में इस वक्त मक्का लहरा रहा है, उसी के बगल में आलू बोया था, लेकिन उसने निराश कर दिया. धरती मैय्या इस बात की गवाह हैं. किसानी कर रहे हम जैसे लोग हर साल एक नयी आशा के साथ फसल के संग दोस्ती करते हैं.
देखिए न, यह सब लिखते हुए मक्का से सीधी बात करने का मन करने लगा है. वैसे नये साल में मक्का का मूड कैसा रहेगा, यह मक्का ही जानता है या फिर प्रकृति. वैसे एक बात तो है, बचपन से लेकर किशोरवय तक मक्का की पत्तियां मुझे खींचती रहती हैं. उसका हरापन मुझे दीवाना बना देता है और जब मूंछ लिये भुट्टा बन कर धरती मैय्या के संग खड़ा हो जाता है, तब लगता है कि बेटा अब जवान हो गया है.
इन सबके बीच माटी को सोना कहनेवाले हम किसानी कर रहे लोग हर फसल को बड़ी ही आशा भरी नजर से देखते हैं. वैसे इस साल धान ने भी हमें सोचने को मजबूर किया है. भोजन के लिए चावल देनेवाली धान ने कम बारिश की वजह से इस बार प्रकृति की मार सही है. किसानी कर रहे लोग परेशान हुए, लेकिन निराश नहीं हुए. दरअसल, किसानी करते हुए हम जीवट हो जाते हैं, हार मानते ही नहीं हैं, क्योंकि हमें विश्वास है कि धरती मैय्या हमें निराश नहीं करेंगी.
नये साल में हमें काफी कुछ नये अंदाज में करना है. ऐसे में पहले हमें मुखौटा उतारना होगा. दरअसल, भागमभाग जिंदगी में हम सब मुखौटा लिये भागते रहते हैं. मुझे इस वक्त अपने प्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु की एक बात याद आ रही है, जिसमें वे कहते हैं- ‘मैं हर दूसरे या तीसरे महीने शहर से भाग कर अपने गांव चला जाता हूं. जहां मैं घुटने से ऊपर धोती या तहमद उठा कर, फटी गंजी पहने, गांव की गलियों में, खेतों-मैदानों में घूमता रहता हूं.
मुखौटा उतार कर ताजा हवा अपने रोगग्रस्त फेफड़ों में भरता हूं.’तो चलिए, नये साल में हम सब पुरानी यादों की पोटली को संभाल कर रखते हैं. दुख-सुख की बातों को मन की चादर में समेट लेते हैं, लेकिन उससे पहले मुखौटा उतार कर फेंक देते हैं. वैसे भी ‘एसएमएस -व्हाट्सअप युद्ध’ आरंभ होनेवाला है. ‘शुभकामना अस्त्र’ छूटेंगे. इन सबके बीच मेरे जैसे किसान की बातों पर जरा ध्यान दीजियेगा.
