मधेसियों को समझाए भारत

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री कुछ माह पूर्व नेपाल ने नये संविधान को लागू किया था. इस संविधान को दूसरी संविधान सभा द्वारा बनाया गया है. पहली संविधान सभा निष्फल रही थी. नेपाल को मुख्यतः दो भूभागों में बांटा जा सकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में आधे से कम जनता रहती है, जबकि तराई में आधे से […]

डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
कुछ माह पूर्व नेपाल ने नये संविधान को लागू किया था. इस संविधान को दूसरी संविधान सभा द्वारा बनाया गया है. पहली संविधान सभा निष्फल रही थी. नेपाल को मुख्यतः दो भूभागों में बांटा जा सकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में आधे से कम जनता रहती है, जबकि तराई में आधे से ज्यादा. दोनों क्षेत्रों की संस्कृति में भिन्नता है. पहाड़ी क्षेत्र के लोगों की जड़ें पहाड़ में हैं, जबकि तराई क्षेत्र के लोगों का भारत से गहरा संबंध है. इनका व्यापार भारत के साथ होता है.
तराई का क्षेत्र ही नेपाल का आर्थिक इंजन है. प्रमुख उद्योग इसी क्षेत्र में हैं. सांस्कृतिक दृष्टि से नेपाल दो हिस्सों में बंटा हुआ है. अल्पमत पहाड़ की अपनी संस्कृति का है, जबकि बहुमत तराई की भारतीय संस्कृति का है. तराई के लोगों को मध्य देशी अथवा मधेसी कहा जाता है. संविधान सभा में मधेसियों की अच्छी उपस्थिति थी. मधेसी सदस्यों की सहमति से नेपाल का संविधान स्वीकार किया गया है.
मधेसी जनता का कहना है कि संविधान में उनके हितों की अनदेखी की गयी है. असंतोष का पहला बिंदु संसद में प्रतिनिधित्व को लेकर है. चुनाव क्षेत्रों को इस प्रकार बांटा गया है कि पहाड़ के आधे से कम लोगों को संसद में 100 सीटें आवंटित की गयी हैं, जबकि तराई के आधे से अधिक लोगों को 65 सीटें.
इन 65 चुनाव क्षेत्रों की सीमाएं भी इस प्रकार निर्धारित की गयी हैं कि कई क्षेत्रों में पहाड़ी लोगों का बाहुल्य स्थापित हो जाता है. इस प्रकार संसद में मधेसियों की आवाज को दबा दिया गया है. उनके असंतोष का दूसरा बिंदु सिविल सर्विस में प्रतिनिधित्व का है.
नेपाल की सिविल सर्विस में पहाड़ी लोगों का बाहुल्य है. कुछ वर्ष पूर्व तराई के जंगलों को निजी खेती के लिए आवंटित किया गया था. यह आवंटन मुख्यतः पहाड़ी लोगों के पक्ष में किया गया था. असंतोष का तीसरा बिंदु नागरिकता का है. तराई में तमाम ऐसे हैं, जो दशकों से वहां रह रहे हैं, परंतु उन्हें नेपाल की नागरिकता के प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं है.
संविधान बनाये जाने की प्रक्रिया के समय भारत सरकार ने नेपाल की सरकार के साथ अंदरखाने वार्ता की थी. नेपाल की सरकार पर दबाव डाला था कि मधेसियों के हितों का ध्यान रखा जाये.
लेकिन, नेपाल सरकार ने भारत के सुझावों की अनदेखी करते हुए ऐसे संविधान को पारित कर दिया, जिसमें संसद में मधेसियों को कम ही प्रतिनिधित्व दिया गया. संविधान सभा में उपस्थित मधेसी प्रतिनिधियों ने इन अन्यायपूर्ण प्रावधानों का विरोध नहीं किया, बल्कि अपने निजी हितों से प्रेरित होकर इन प्रावधानों को स्वीकार कर लिया. पहाड़ी प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर अपने हितों की रक्षा की, जबकि मधेसी प्रतिनिधियों ने आपसी फूट के चलते वर्तमान अन्यायपूर्ण संविधान को स्वीकार कर लिया.संविधान के लागू किये जाने के साथ तराई के क्षेत्रों में उग्र आंदोलन शुरू हो गया.
आंदोलनकारियों ने भारत तथा नेपाल की सीमा पर अवरोध पैदा किया. तमाम आवश्यक वस्तुओं जैसे ईंधन तेल की नेपाल को सप्लाई भारत से तराई क्षेत्र के रास्ते होती है. सीमा पर अवरोध पैदा होने से नेपाल को माल की सप्लाई थम गयी. नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में यह भावना पनपने लगी कि भारत ने मधेसियों को उग्र आंदोलन करने को प्रेरित किया है. भारत से जरूरी माल का आयात बाधित होने पर नेपाल चीन की शरण में गया. चीन ने मौके का लाभ उठाते हुए नेपाल को जरूरी माल उपलब्ध कराया.
फलस्वरूप नेपाल में भारत को दुश्मन तथा चीन को मित्र भाव से देखा जाने लगा. नेपाल के प्रमुख लोगों का मानना रहा कि भारत द्वारा नेपाल के आंतरिक मामलों में अनावश्यक दखल की जा रही है. भारत ने न तो मधेसियों पर दबाव बनाया कि जरूरी माल का आवागमन होने दे और न ही इन रास्तों के माध्यम से नेपाल को माल सप्लाई किया.
हाल में नेपाल सरकार ने मधेसियों की संसद में प्रतिनिधित्व की प्रमुख मांग को स्वीकार कर लिया है. परंतु मधेसियों के तमाम संगठन संतुष्ट नहीं हैं. वे सिविल सर्विस में प्रतिनिधित्व तथा नागरिकता के मामलों का भी निबटारा तत्काल चाहते हैं. नेपाल में जारी इस गतिरोध के बीच भारत को अपनी नीति निर्धारित करनी है. भारत के सामने दो रास्ते हैं.
एक, मधेसियों के साथ खड़े होकर नेपाल सरकार पर दबाव डाले कि अन्य मांगों का भी तत्काल निस्तारण हो. इस नीति में संकट है कि नेपाल को हम चीन के पाले में ढकेल देंगे. दूसरा, मधेसियों पर दबाव डाला जाये कि संसद में प्रतिनिधित्व के प्रमुख मुद्दे को स्वीकार करके वर्तमान गतिरोध समाप्त करें.
शेष मांगों को समय क्रम में वार्ता से सुलझाया जाये. इस नीति में मधेसियों में असंतोष बने रहने की संभावना है. दूसरी नीति ही उपयुक्त है. सभी मांगों को तत्काल मनवाने का कड़ा रुख अपनाने पर परिणाम घातक हो जायेंगे, यदि नेपाल चीन की गोद में जाकर बैठ गया.

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