दादरी में एक बेगुनाह इंसान को अपने घरवालों की मौजूदगी में इसलिए मार डाला गया कि उसके बारे में यह अफवाह फैलायी गयी थी कि वह गोमांस का भक्षण कर रहा था! क्लेषदायक बात यह है कि गोमांस को ले कर उग्र व आक्रामक तेवर अपनानेवाले अपने समर्थक हिंदू कट्टरपंथियों पर अंकुश लगाने में सरकार असमर्थ दिखायी दी. यह दलील लचर थी कि कानून अौर सुव्यवस्था तो राज्य सरकार की जिम्मेवारी हैं. इस प्रकरण में प्रधानमंत्री की चुप्पी ने उन सभी को निराश किया, जो उनके साथ उनकी मन की बातों काे साझा करते रहे हैं, इस भरोसे के साथ कि उनका एजेंडा विकास का है अौर इसी आधार पर भाजपा को स्पष्ट जनादेश मिला है. बहुसंख्यक समुदाय की यही असहिष्णुता बारंबार अन्यत्र भी उजागर हुई. दबंगई वाले अंदाज में कभी कोई स्वयंभू संत, तो कभी कोई प्रतिष्ठित महंत या फिर जुझारू साध्वी यह चेतावनी देते रहे कि यदि उनकी निगाह में कोई देशद्रोही विधर्मी कुछ वर्जित आचरण करेगा, तो वह मरने-मारने पर आमादा होने को मजबूर होंगे. ऐसा कहनेवालों पर जब कानून का शिकंजा कसने से सरकार ने कोताही की, तो आमजन को लगा कि कानून के राज में खोट आ रही है.
गुजरते साल की खट्टी-मीठी यादें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिग्विजय में अब शायद पाकिस्तान को भी शामिल किया जा सकता है, लेकिन कुल मिला कर 2015 में ‘क्या खोया क्या पाया’ का लेखा-जोखा अभी बाकी है. हर जाता हुआ साल अपने पीछे छोड़ कुछ खट्टी-मीठी यादें जाता है- कुछ आधी-अधूरी उपलब्धियों का एहसास, कुछ निराशा, कुछ दिलासा! वर्ष 2015 इसका […]

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिग्विजय में अब शायद पाकिस्तान को भी शामिल किया जा सकता है, लेकिन कुल मिला कर 2015 में ‘क्या खोया क्या पाया’ का लेखा-जोखा अभी बाकी है.
हर जाता हुआ साल अपने पीछे छोड़ कुछ खट्टी-मीठी यादें जाता है- कुछ आधी-अधूरी उपलब्धियों का एहसास, कुछ निराशा, कुछ दिलासा! वर्ष 2015 इसका अपवाद नहीं. जहां तक देश का सवाल है, कुछ बातें आम आदमी को आशंकित करनेवाली प्रकट हुईं. इनमें बढ़ती असहिष्णुता प्रमुख है. जहां तक शहरी संपन्न नागरिकों के लिए यह अिभव्यक्ति की बुनियादी आजादी का संकटग्रस्त होना था, वहीं समाज के अल्पसंख्यक तबके के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन गया.
इसी तरह उच्चतर न्यायपालिका के कुछ फैसलों ने भी यह धारण पुष्ट की कि कानून के सामने सभी नागरिक समान नहीं हैं. मशहूर हस्तियां, फिल्मी सितारे, राजनेता अौर धनकुबेर पहले तो अपनी पहुंच से मुकदमों को ढिलाते रहते हैं, फिर गवाहों के पलटने तथा सबूतों के अभाव में राहत पाते हैं. दोहरे मानदंड छुपाये नहीं छिपते. उपहार कांड के अभियुक्त अंसल बंधुअों के प्रति सुप्रीम कोर्ट की हमदर्दी-उम्र के कारण-समझ नहीं आती, जब उनसे कहीं बुजुर्ग चौटाला कारावास भोग सकते हैं. सलमान खान की रिहाई, संजय दत्त को बारंबार पैरोल सुर्खियों में रही. हाइकोर्ट के न्यायाधीशों पर अशोभनीय आरोप लगे अौर इनकी जांच के बाद जितनी जल्दी इन्हें खारिज कर दिया, उससे यह मांग तर्कसंगत लगने लगी कि जजों की नियुक्ति ही नहीं, न्यायपालिका की जवाबदेही के बारे में सार्वजनिक जनतांत्रिक बहस जरूरी है अौर टाली नहीं जा सकती.
विधायिका अौर संसद ने भी नागरिकों को निराश किया. खास कर, संसद की कार्यवाही जिस तरह निरंतर स्थगित हुई अौर समय के अपव्यय के साथ कानून बनाने के अपने मुख्य काम से सांसद विरक्त रहे अौर सारा समय प्रतिपक्षी पर लांछन लगाते बीत गया, वह निश्चय ही शोचनीय है. यह समझ पाना कठिन है कि खुद को सर्वोपरि माननेवाले निर्वाचित प्रतिनिधि कैसे इतने निरंकुश हो सकते हैं. सर्वसहमति होती है, तो वेतनमान, विशेषाधिकार, सुविधाओं में बढ़ोत्तरी के मामले में ही. संसद अौर न्यायपालिका दोनों एक-दूसरे पर लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का आरोप लगाने से बाज नहीं आते. ऐसे में सबसे बड़ा खतरा अराजकता के ज्वार का है. जब पीड़ित को न्याय दिलाने में सरकार अौर अदालतें असमर्थ नजर आती हैं, तब वह इंसाफ के लिए या तो आपराधिक तत्वों का सहारा लेता है या कानून अपने हाथ में.
नागरिक के अधिकारों के पहरुए के रूप में पहचाने जानेवाले मीडिया ने जितनी आसानी से हाशिये पर जाना पसंद किया, वह शर्मनाक ही कहा जा सकता है. सांप्रदायिक फासीवादी तानाशाही के उभार के प्रति चिंतातुर मुखर सार्वजनिक बुद्धिजीवियों की अभिव्यक्ति की आजादी में किसी कटौती को दर्ज कराना कठिन है, पर मीडिया ने खुद पर ही जो सेंसरशिप लागू की है, उससे लगता है कि हवा में तलवारें भांज कर ही वह संतुष्ट है. सीधे नाम लेकर या ठोस आरोप जो प्रमाणित किये जा सकते हों, ऐसे खुलासे बस खेल की दुनिया में ही हुए!
जिस बात ने आशा जगायी, वह बिहार का चुनाव था. यह सच बिना राजनीतिक दलगत पक्षधरता के स्वीकार किया जाना चाहिए कि भाजपा के खिलाफ खड़े महागंठबंधन ने यह जगजाहिर कर दिया कि जमीनी हकीकत को अनदेखा करनेवाले चुनाव प्रबंधक सिर्फ प्रधानमंत्री के करिश्मे के सहारे चमत्कार नहीं कर सकते. जनतंत्र की सेहत के लिए सबल समर्थ विपक्ष की अनिवार्यता है. इस अर्थ में बिहार ने सत्ता के अतिकेंद्रीकरण का उतावला उफान निश्चय ही थाम लिया.
भ्रष्टाचार के खुलासों में लिप्त राजनेता बड़ी ढिठाई से निरापद अपने पदों पर बने रहे. वसुंधरा राजे, सुषमा स्वराज आदि बिना किसी जांच के ही निर्दोष करार दिये गये. अब अरुण जेटली भी यह सुख भोग रहे हैं. अौर तो अौर आम आदमी पार्टी भी बेदाग नहीं बची. 2014 में भ्रष्टाचार मुक्त भारत की जो आशा जगी थी, उसे धूमिल होते देर नहीं लगी.
विदेश नीति के क्षेत्र में मोदी के ताबड़-तोड़ दौरों की रफ्तार बदस्तूर जारी रही अौर यह नकारा नहीं जा सकता कि भारत की अंतरराष्ट्रीय हस्ती में लगातार इजाफा हुआ. अब देखना यह है कि छवि में सुधार का लाभ क्या देश की अर्थव्यवस्था को होता है या किस हद तक हमारी सामरिक सुरक्षा बेहतर होती है. मेरा मानना है कि राजनय में पलक झपकते किसी नाटकीय लाभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन इस मामले में सावधान रहने की दरकार है कि कहीं गतिशील सक्रियता के अतिरेक में आकर हम अपने लक्ष्य ही को ना भूल जायें.
सौभाग्य से इस वर्ष मॉनसून ने भी साथ दिया अौर तेल की कीमतों ने भी, लेकिन यह मान कर चलना घातक होगा कि यह स्थिति आनेवाले समय में भी बनी रहेगी. इसके अलावा, हम अरब जगत में इसलामी विरोध के बढ़ते खतरे के भारत पर पड़नेवाले असर को नजरंदाज नहीं कर सकते. न ही हम यह भुला सकते हैं कि हमारे पड़ोस में नेपाल में मधेसी अांदोलन का लावा कभी भी बह कर हमारे यहां पहुंच सकता है. जापान के साथ बढ़ती दोस्ती का असर चीन के साथ हमारे रिश्तों पर पड़े बिना नहीं रहेगा. एक-न-एक दिन हमारी सरकार को यह चुनना ही पड़ेगा कि पूर्व एशिया में हमारा असली सामरिक साझीदार कौन है? यही बात अमेरिका अौर रूस पर भी लागू होती है. नरेंद्र मोदी की दिग्विजय में अब शायद पाकिस्तान को भी शामिल किया जा सकता है, लेकिन कुल मिला कर 2015 में ‘क्या खोया क्या पाया’ का लेखा-जोखा अभी बाकी है.
पुष्पेश पंत
वरिष्ठ स्तंभकार
pushpeshpant@gmail.com