सरकार की अर्द्धवार्षिक आर्थिक समीक्षा में चालू वित्त वर्ष में वृद्धि दर के अनुमान को घटा दिया गया है. फरवरी में सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में 8.1 से 8.5 फीसदी की सालाना वृद्धि का आकलन था, पर अब इसे 7 से 7.5 फीसदी कर दिया गया है. वित्त वर्ष 2015-16 की पहली छमाही में विकास दर 7.2 फीसदी रही है.
समीक्षा में अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद चुनौतियों को लेकर चिंताएं व्यक्त की गयी हैं, पर उसमें ठोस प्रगति का भी उल्लेख है. इसी आधार पर वित्तीय घाटे को 3.9 फीसदी और राजस्व घाटे को 2.8 फीसदी तक लाने का लक्ष्य दोहराया गया है. साथ ही भरोसा दिया गया है कि सरकारी खर्च में बड़ी कटौती के बिना घाटा कम किया जायेगा और फिलहाल पूंजी व्यय में 0.5 फीसदी की वृद्धि भी हुई है.
लेकिन, आर्थिक प्रगति को लेकर चिंताएं बड़ी हैं. वृद्धि दर के अनुमान में कमी के प्रमुख कारण कमजोर मॉनसून और निर्यात में भारी कमी बताया गया है. एशिया की इस तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में निर्यात का हिस्सा करीब 20 फीसदी है और इसमें पिछले साल भर से लगातार कमी आ रही है. दो वर्षों के कमजोर मॉनसून, महंगाई, ग्रामीण आय और निर्माण क्षेत्र में कमी, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में वृद्धि जैसे कारक वृद्धि दर को संकुचित कर रहे हैं.
समीक्षा में कहा गया है कि निजी उपभोग और सार्वजनिक निवेश से वृद्धि दर को आधार मिल रहा है. यह सकारात्मक स्थिति नहीं है. सातवें वेतन आयोग और पूर्व सैनिकों के पेंशन में वृद्धि से सरकार की आगामी योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं.
ऐसे में कल्याणकारी योजनाओं में अधिक कटौती करनी पड़ सकती है. मौजूदा कटौतियों से निम्न वर्ग तथा ग्रामीण क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव हो रहे हैं. इस महीने के शुरू में रिजर्व बैंक ने भी सुझाव दिया था कि सार्वजनिक पूंजी व्यय में वृद्धि और निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए नीतिगत सुधार तथा व्यापार-वाणिज्य के लिए स्थितियां सुगम बनाने की जरूरत है.
इससे पहले सितंबर में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि अभी अर्थव्यवस्था में ठोस सुधार के संकेत नहीं है. संसद में जारी गतिरोध से भी आर्थिक मोर्चे पर जीएसटी विधेयक सहित जरूरी नीतिगत पहलों और चर्चाओं में बाधा उत्पन्न हो रही है. ऐसे में जरूरी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दलगत भावना से ऊपर उठ कर देश के समक्ष मौजूद आर्थिक चुनौतियों के बारे में एक साथ सोचें और कोई कारगर कदम उठाएं.
