विधि के शासन में भय का माहौल

देश के चीफ जस्टिस ने कहा है कि हमारे यहां विधि का शासन है. जब तक स्वतंत्र न्यायपालिका है, जब तक अदालतें अधिकारों और प्रतिबद्धताओं को कायम रखे हुए हैं, तब तक किसी को डरने की जरूरत नहीं है. हो सकता है कि उनका यह कथन सौ फीसदी सही हो, पर मुख्य न्यायाधीश को यह […]

देश के चीफ जस्टिस ने कहा है कि हमारे यहां विधि का शासन है. जब तक स्वतंत्र न्यायपालिका है, जब तक अदालतें अधिकारों और प्रतिबद्धताओं को कायम रखे हुए हैं, तब तक किसी को डरने की जरूरत नहीं है.
हो सकता है कि उनका यह कथन सौ फीसदी सही हो, पर मुख्य न्यायाधीश को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ, ताकि देश के दबे-कुचले लोगों को विधि के तहत इंसाफ मिल सके, पर यह विडंबना ही है कि देश में पूर्णत: संविधान के अनुकूल शासन संचालित नहीं हो पाया है. परिणाम विपरीत आते रहे हैं.
इसके पीछे मुख्य कारण कानून का दुरुपयोग है. मुजरिमों को तो मुश्किल से ही दंड मिलता है. हां, जो बेगुनाह होता है, वह बेचारा कानून की चंगुल में जरूर फंस जाता है. जिस देश में कानून के रखवाले भय का माहौल पैदा करते हों और जहां फैसला आने में वर्षों लग जाते हों, वहां भला भयमुक्त जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है.
-बैजनाथ महतो, बोकारो

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