जब आप अपने दिल की सुनेंगे, तब बेहतर काम करेंगे.’ लेकिन जरा ठहर कर सोचें, तो इस जवाब के अंदर एक सवाल भी नजर आयेगा- क्या हमारी सरकारें, शिक्षा व्यवस्था और समाज नयी पीढ़ी को अपनी रुचि के काम करने के लिए पर्याप्त मौके उपलब्ध करा रहा है, उसमें मददगार हो रहा है? इसका एक जवाब पिचाई के एक अन्य जवाब में ही पढ़ा जा सकता है.
जब उनसे पूछा गया कि 12वीं में आपको कितने अंक आये थे, तो उनका जवाब था, ‘इतने अंक नहीं आये थे, जिसमें दिल्ली के इस प्रतिष्ठित कॉलेज में एडमिशन मिल पाता’. इस जवाब के आइने में देखें तो स्पष्ट है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में सालाना परीक्षा के अंक के अलावा भविष्य के होनहार को परखने की कोई और वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. हमारा देश अभी ऐसे सवालों में ही उलझा है कि दसवीं तक विद्यार्थियों को सालाना पास-फेल की प्रक्रिया में फंसाया जाये, या उससे मुक्त रखा जाये. शिक्षाविद् वर्षों से कह रहे हैं कि सालाना परीक्षा प्रणाली विद्यार्थियों में रटने की प्रवृत्ति विकसित करती है, नये अनुसंधान या नवाचार के लिए प्रेरित नहीं करती. पिछले कुछ दशकों में सूचना-तकनीक के साथ ज्ञान-विज्ञान की दुनिया जिस तेजी से बदली है, वह शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में भी बड़े बदलाव की मांग करती है.
पिचाई ने अपने एक और महत्वपूर्ण जवाब में कहा, ‘इंटरनेट इस्तेमाल के मामले में महिलाओं की भागीदारी पूरी दुनिया में कम है और भारत में तो यह एक तिहाई से भी कम है. आज के समय में एक राष्ट्र महिलाओं को भी इंटरनेट से जोड़ कर राष्ट्र की प्रगति में सहभागी बना सकता है.’ पिछले दिनों जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि किसी देश में मानव-विकास बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वहां की आबादी क्या और किस प्रकार का काम करती है. साथ ही सुझावा गया था कि इंटरनेट ने आज मानव जीवन को जिस कदर प्रभावित किया है, उसके मद्देनजर सरकारों को इंटरनेट के विकास को अपनी नीतियों में शामिल करना चाहिए. उम्मीद करनी चाहिए कि पिचाई की सलाह पर युवाओं के साथ-साथ हमारी सरकारें और हमारा समाज भी गौर करेगा.
