विदेश में जमा कालेधन पर अंकुश की कोशिशों के बीच यह बात भी सामने आती रही है कि इसका सटीक आंकड़ा सरकार के पास नहीं है. पर, कालाधन पर शोध करनेवाली अमेरिकी संस्था ‘ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी’ (जीएफआइ) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 2004 से 2013 के बीच भारत से 510 अरब डॉलर कालाधन विदेश गया है.
औसतन 51 अरब डॉलर सालाना. यह राशि कितनी बड़ी है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि भारत का सालाना रक्षा बजट इससे कम (करीब 50 अरब डॉलर) है. कालाधन विदेश भेजने में भारत चौथे स्थान पर है और सिर्फ चीन, रूस तथा मैक्सिको ही हमसे आगे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, इन दस वर्षों में विकासशील तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं में गैरकानूनी धन, कर चोरी, भ्रष्टाचार व अन्य गैरकानूनी गतिविधियों से रिकाॅर्ड कालाधन पैदा हुआ है.
फिलहाल मोदी सरकार यह कह कर देश को आश्वस्त कर सकती है कि रिपोर्ट के आंकड़े 2013 तक के हैं, लेकिन रिपोर्ट में यह संकेत स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर गैरकानूनी आर्थिक गतिविधियां चरम पर हैं. भाजपा ने 2011 में कालाधन का आकार 100 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बताया था. पार्टी ने 2014 के आम चुनाव में कालाधन की जांच और उसे देश में वापस लाने का वादा किया था. मोदी सरकार ने डेढ़ साल के कार्यकाल में कालेधन पर अंकुश के कई कदम उठाये भी हैं.
पिछले साल अक्तूबर में स्विट्जलैंड सहित कुछ देशों के अधिकारियों से बातचीत के बाद कई यूरोपीय देशों के बैंकों ने भारतीय ग्राहकों से कहा है कि वे भारत सरकार के आयकर विभाग के सामने अपने खातों का खुलासा करें. इस साल मई में ब्लैक मनी एंड इम्पोजिशन ऑफ टैक्स एक्ट लाया गया, जो एक जुलाई से प्रभावी हुआ. इसमें अधिक जुर्माना और कैद का प्रावधान है. इसके तहत अघोषित संपत्ति का सितंबर तक खुलासा करनेवालों से कम टैक्स व जुर्माना वसूलने का प्रावधान था, पर उम्मीद से बेहद कम धन का खुलासा हुआ. कालाधन के खिलाफ कभी आंदोलन करनेवाले बाबा रामदेव ने पिछले दिनों कहा कि देश में कालाधन बढ़ता ही जा रहा है.
अब जीएफआइ की रिपोर्ट का संकेत भी साफ है कि विदेश में जमा कालेधन को लाने के प्रयासों के साथ देश में कालाधन पैदा करनेवाली आर्थिक गतिविधियों पर अंकुश के कदम और अधिक तत्परता से उठाने की जरूरत है. उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार इस दिशा में सफल होगी और कुछ वर्षों बाद जब जीएफआइ की रिपोर्ट आयेगी, तब भारत की स्थिति सुधरी हुई दिखेगी.
