बदलते वैश्विक परिदृश्य से मुकाबला करने केलिए भारत ने भी अपने अंदर बड़े बदलाव किये हैं. गांवों को कस्बों, कस्बों को नगरों तथा नगरों को महानगर बनाने के प्रयास जारी हैं. लोगों ने बेहतर जीवनशैली व जीविकोपार्जन के िलए बड़े शहरों का रुख किया और सुंदर लगनेवाली जीवनशैली को अपनाया. पुरातन भारत ने समृद्ध संस्कृति की बदौलत जनमानस को सभ्य व अनुशासित बनाया. बड़ों को प्रणाम करना, गुरुजनों को आदर करना तथा माता-पिता की आज्ञा का पालन करना जैसे संस्कारों से परिपूर्ण समाज की स्थापना की.
आज मध्यम स्तर के शहरों में दैनिक जीवन में होनेवाली परेशानी हमारी अनुशासनहीनता का ही परिणाम है. जहां-तहां कचरा फेंकना, गलत जगह गाड़ी पार्क करना, उद्यानों में गंदगी फैलाना, पंक्तिबद्ध होकर काम कराने के बजाय गलत रास्ता अपनाना, जहां-तहां थूकना, अवैध कब्जा और अगर कोई विरोध करे तो धमकी देना, यह हमारी संस्कृति की विरासत का हिस्सा तो नहीं? ऐसा ताे नहीं कि हमने अच्छाइयों के कसीदे पढ़ते-पढ़ते खुद को शैतान बना लिया हो. आज हमारा देश ऐसा ही है. हमने बुराई के रास्ते पर चलना स्वीकारा है.
अनुशासनहीनता का खामियाजा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमें ही भुगतना पड़ रहा है. गैर-अनुशासित व असभ्य व्यक्ति स्वयं गलत करता है. इस से वह दूसरे व्यक्ति द्वारा गलत करने का विरोध नहीं करता. ऐसी प्रवृत्ति से स्वार्थ भावना पनपनती है. बुराई का विरोध कुंद पड़ जाता है. जिससे निजी हितों के वशीभूत हम ऐसे लोगों को समाज का प्रतिनिधित्व सौंप देते हैं, जो हमारे ही धन की बंदरबाट करने लगते हैं. इससे हमारा अप्रत्यक्ष नुकसान होता है. अत: हमें सबसे पहले खुद को अनुशासित करना होगा. क्योंकि, ‘‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है.’’
मुकेश मोदी, चास, बोकारो
