विदेशों की नकल करके आज अपना देश विकसित तो हुआ, परंतु नकल के साथ उनकी सभ्यता भी विदेशों से ले ली. यहां तक कि आज हम और आप यह सोचने को मजबूर हो गये हैं कि क्या हमारा समाज टूटन का शिकार तो नहीं हो गया है? अपनी बदलती सभ्यता पर अब क्या कोई ध्यान देगा. लेकिन, अब भी सुधरने का वक्त है, जिससे अपना समाज पहले जैसे हो जाये. क्योंकि, यह वही समाज है, जहां मां-बेटियों को देवी का दर्जा प्रदान था और आज वही समाज अपनी सभ्यता भूल कर मां-बेटियो का अपहरण, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहा है.
क्या यही विकास है. समाज के विकास के बारे में किसी को सोचना तो दूर, चिंता तक नही है. हमारे मनीषियों ने तो यहां तक कहा है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहीं देवताओं का वास होता है. आज इसी समाज में भ्रूण हत्या कर दी जाती है. महान दार्शनिक अरस्तु ने कहा था कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. हम समाज के साथ जीते भी है. इसके विपरित इसका दूसरा पहलू यह है कि समाज का एकाकीपन हमारे अंदर नीरसता का भाव उत्पन्न करता जा रहा है. दुनिया भर की ये घटनाएं अब पूरे भारत में भी डेंगू और मलेरिया के मच्छर की भांति शहरों से शुरू होकर ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच चुका है. इससे हमारे जनजीवन पर बुरा असर पड़ रहा है.
आज की नयी युवा पीढ़ी सहित हम सभी भारतीयों को यह संकल्प लेना चाहिए कि सभी माताओं-बहनों को वही सम्मान दें, जो पहले था. समाज में बढ़ रहे अपराध से कैसे निबटा जाये, इसे कैसे मिटाया जाये़, अपनी सोच कैसे बदली जाये, विचार करना होगा, तभी समाज गांधी, विवेकानंद, राजाराम मोहन राय, ज्योतिबा फूले, पेरियार द्वारा निर्मित सभ्यता वापस आ सकती है. देश के विकास के साथ हमारे प्रधानमंत्री को समाज का विकास करना भी जरूरी है.
Àगोलू यादव, बलिया
