चुनावी नतीजों के लिहाज से देश में डेढ़ साल के भीतर यह तीसरी सुनामी है. मई, 2014 में हुए आम चुनाव के नतीजों ने केंद्र की सत्ता पर काबिज यूपीए-2 सरकार के खोखलेपन को भरा था. इस चुनावी सुनामी को नरेंद्र मोदी की लहर के नाम से पुकारा गया. दिल्ली में फरवरी, 2015 की चुनावी सुनामी ने भारतीय लोकतंत्र के भीतर आम आदमी की ताकत को फिर स्थापित करने की कोशिश की. इस सुनामी को अरविंद केजरीवाल के उभार के नाम से पढ़ा गया.
इसके बाद नवंबर, 2015 में आयी है बिहार की चुनावी सुनामी. इस सुनामी ने गरज कर अपना संदेश सुनाया है कि विकास में समाज के विशाल वंचित वर्गों की समानतापूर्ण भागीदारी के सवाल को ज्यादा समय तक दरकिनार करके नहीं रखा जा सकता है. तीनों चुनावी सुनामियों के संदेश से झांकती जनआकांक्षाओं को पढ़ने की कोशिश करें, तो एक साफ और सच्ची बात सामने आयेगी. बात यह कि राजनीतिक नेतृत्व को मजबूत, विनम्र और वंचितों का पक्षधर होना चाहिए. यह सुनामी सरीखी जीत किसी तात्कालिक संयोग का नतीजा नहीं है. नीतीश ने लगातार दस वर्षों के अपने नेतृत्व के जरिये विकास को तवज्जो देने तथा वंचितों के पक्षधर मुख्यमंत्री की छवि पेश करने में सफलता पायी है.
मुख्यमंत्री के रूप में सुशासन (भ्रष्टाचार और अपराधमुक्त बिहार) और विकास (सड़क, बिजली और खेती-किसानी) के अपने फैसलों पर एक दफे मजबूती से कदम उठा लेने के बाद उन्होंने कभी अपने कदम वापस नहीं खींचे. उनके फैसले युवाओं से लेकर महिलाओं और अतिपिछड़ा वर्ग तक सबके लिए समावेशी और सशक्तीकरण करनेवाले रहे. चुनावी सर्वेक्षणों में उनके विरोधी मतदाताओं ने भी माना था कि नीतीश कुमार एक बेहतर मुख्यमंत्री रहे हैं. इस जनादेश के साथ नीतीश कुमार ने यह बात फिर सिद्ध की है कि एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री राष्ट्रीय रुझानों के विपरीत राज्य के चुनावों में जीत हासिल कर सकता है. एक प्रदेश के चुनाव में पूरे देश की जिस तरह की दिलचस्पी दिखी, वह अभूतपूर्व है. जीत-हार के कारणों के विश्लेषण तो होते रहेंगे, पर कुछ कारक स्पष्ट हैं. मसलन, जद (यू), राजद और कांग्रेस ने जिस परिपक्वता के साथ गंठबंधन को आकार दिया, वैसी मिसाल कम ही मिलती है. दोनों ने ऐसी अनेक सीटें एक-दूसरे को और कांग्रेस को दीं, जिन पर उनका मजबूत दावा हो सकता था. चुनाव की घोषणा से पहले ही सीटों के लेन-देन का काम पूरा हो चुका था.
इससे जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में तालमेल बनाने में सहूलियत मिली. ‘फिर से नीतीशे’ के नारों के बीच सौम्य, किंतु चुस्त प्रशासक की नीतीश की छवि के साथ लालू प्रसाद की भदेस बेबाकी ने महागंठबंधन के अभियान को विकास और सामाजिक न्याय के संतुलित एजेंडे का आधार दिया. दोनों नेताओं के लंबे राजनीतिक अनुभव और जनता की नब्ज पहचानने की क्षमता के चलते ही महागंठबंधन प्रतिद्वंद्वी एनडीए पर बड़ी बढ़त बनाने में कामयाब रहा. लालू-नीतीश की इस सियासी जुगलबंदी को कांग्रेस का भी भरपूर समर्थन मिला. दूसरी ओर, सीटों और टिकटों को लेकर सहयोगी दलों में आपसी और आंतरिक उठापटक की खबरों से भाजपानीत एनडीए की काफी किरकिरी हुई. कई सीटों पर इसके कार्यकर्ता एकजुट नहीं हो सके.
महागंठबंधन के दोनों नेताओं के बरक्स भाजपा में राज्य स्तर पर कद्दावर नेताओं की कमी और मुख्यमंत्री पद के लिए उम्मीदवार की घोषणा न होना भी आम मतदाताओं को नहीं लुभा पाने के कारण बने. एनडीए के बदलते चुनावी पैंतरों से यह संदेश भी गया कि उसके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के अलावा कोई अन्य ठोस आधार नहीं है. यह साबित हुआ कि ऐन चुनाव के मौके पर बड़बोलेपन का बड़ा असर पड़ता है. दबी जुबान से ही सही, अब भाजपा के कई नेता भी मानने लगे हैं कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और भाजपा के कई नेताओं के बयानों से एनडीए का प्रचार अभियान विकास के एजेंडे से कुछ भटक गया और ऐसे बयानों को महागंठबंधन के नेता अपने फायदे में भुनाने से नहीं चूके. बहरहाल, स्पष्ट एवं व्यापक जनादेश के बावजूद मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार की तीसरी पारी इस मायने में बेहद चुनौतीपूर्ण होगी कि उन्हें जहां बिहार की जनता की विकास की बढ़ी आकांक्षाओं को पूरा करना है, वहीं जंगलराज की वापसी के विपक्ष के आरोपों को निराधार भी साबित करना है. उन्हें चुनाव के दौरान जाति और धर्म की राजनीति के नाम पर राज्य के कुछ समुदायों के बीच पैदा हुए मनभेद को भी पाटना है. उम्मीद करनी चाहिए कि नीतीश सरकार जनादेश की अपेक्षाओं पर खरी उतरेगी और भाजपानीत एनडीए भी एक जिम्मेवार विपक्ष की अपनी भूमिका को बखूबी समझेगा.
