राजीव रंजन झा
संपादक, शेयर मंथन
आजकल नवांकुर उद्यमों (स्टार्टअप) की बहुत चर्चा है. केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस पर काफी जोर है कि भारत में नवांकुर उद्यमों को बढ़ावा दिया जाये. सरकार ने कई प्रयास किये हैं और खबरें हैं कि इस बारे में कई प्रयास आगे भी सामने आनेवाले हैं.
लेकिन क्या भारत में अभी वह परिवेश है, जिसमें कोई अगला गूगल या फेसबुक या अमेजन बन पाये? या हम पहले से तैयार खांचों में ही, पहले किसी और देश के बाजार में सफल हो चुकी धारणाओं की ही प्रतिलिपियां बनाने में जुटे हैं? अमेजन ने इंटरनेट पर खरीदारी का एक मॉडल विकसित किया, तो उसकी प्रतिलिपि के रूप में यहां फ्लिपकार्ट, स्नैपडील जैसी वेबसाइट्स आ गयीं. फिर खुद अमेजन भी यहां के बाजार में आ गयी.
विदेशों में हवाई जहाज के टिकट और होटल की बुकिंग के लिए वेबसाइटें शुरू हो गयी थीं, भारत में नहीं थीं. दीप कालरा ने इसमें एक अवसर देखा और मेक माई ट्रिप शुरू हो गयी. इसे सफलता मिलने लगी तो वेंचर कैपिटल निवेशकों से पूंजी जुटा कर उसी तर्ज पर चार-पांच और वेबसाइटें शुरू हो गयीं. भारत में इंटरनेट पर उद्यमिता के जितने प्रयोग हो रहे हैं, उनमें से कितने ऐसे हैं जो विश्व में पहली बार यहीं होते दिख रहे हैं?
आप कह सकते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था विकास के जिस चरण में है, उसमें भारत में बैठा उद्यमी यहां की स्थितियों में कोई नयी कल्पना करेगा, तो काफी संभावना है कि उस तरह की चीज पहले से अमेरिका और यूरोप के विकसित बाजारों में तैयार की जा चुकी हो. इंटरनेट की पैठ जिन देशों में ज्यादा है, आखिर इंटरनेट से जुड़े प्रयोग भी पहले वहीं होंगे. इसलिए यह अपने-आप में स्वाभाविक है कि इंटरनेट से जुड़ी उद्यमिता पश्चिमी देशों में ही पहले फलीभूत हुई है.
लेकिन, यह तर्क उन उद्यमों के लिए सही है, जहां बाजार विकसित करने के लिए एक अनुकूल परिवेश की जरूरत होती है. आप इंटरनेट पर फल-सब्जी बेचना चाहते हैं तो जरूरी है कि बहुत सारे लोग पहले से इंटरनेट पर मौजूद हों. इसीलिए 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में या इस सदी के पहले दशक में जब कुछ लोगों ने भारत में इंटरनेट पर फल-सब्जियां बेचने की कोशिश की, तो उन्हें सफलता नहीं मिली.
लेकिन, इंटरनेट पर तलाश का बेहतर कोड विकसित करने के लिए तो लोगों की बड़ी संख्या जरूरी नहीं है. गूगल का बेहतर विकल्प देने के लिए तो यह जरूरी नहीं है कि भारत में बहुत ज्यादा लोग इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हों.
खैर, अब तो इंटरनेट भारत में भी काफी फैल चुका है और मोबाइल के जरिये उन हाथों में भी पहुंच चुका है, जो हाथ कंप्यूटर तक नहीं पहुंचते. इसलिए अब यह भी नहीं कहा जा सकता कि कोई चीज विश्व में सबसे पहले भारत में हो, इसके लिए जरूरी इंटरनेट पैठ भारत में नहीं है.
तो क्या उम्मीद की जा सकती है कि गूगल या फेसबुक को अगली चुनौती भारत से मिलेगी?
सितंबर के अंत में जब प्रधानमंत्री ने सिलिकन वैली की यात्रा की, तो फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग, गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट के कार्यकारी चेयरमैन एरिक शिमिट, टेस्ला के सीइओ एलोन मस्क और माइक्रोसॉफ्ट के सीइओ सत्या नडेला जैसे व्यक्तियों से मिले. इस यात्रा का सीधा मकसद इन वैश्विक कंपनियों को भारत में उद्यमिता की नयी लहर पैदा करने के लिए आमंत्रित करना था. इन कंपनियों के लिए भारत एक बड़ा बाजार और मानव संसाधन का बड़ा स्रोत है. कोई गूगल किसी माइक्रोसॉफ्ट के इन्क्यूबेशन सेंटर में पैदा नहीं होता.
वह माइक्रोसॉफ्ट के विशाल साम्राज्य के सामने एक नन्ही सी शुरुआत करके विशाल चुनौती में बदल जाता है. खुद माइक्रोसॉफ्ट ने जब नवांकुर के रूप में अपनी नन्ही शुरुआत की थी, तो उस समय की विशालकाय कंपनियों के तत्कालीन मॉडलों को चुनौती दी थी. लेकिन, जब वह सॉफ्टवेयर बाजार की विशालतम कंपनी में बदल गयी तो उसका चरित्र एकाधिकारवादी हो गया. आज कुछ वैसी ही स्थिति गूगल की है. एक छात्रावास के कमरे से पैदा फेसबुक पर आज पूरे इंटरनेट के चरित्र को ही एकाधिकारवादी बना देने की कोशिशें करने का आरोप लग रहा है.
भारत आकर मार्क जुकरबर्ग सफाई देते हैं कि वे नेट न्यूट्रलिटी यानी इंटरनेट की तटस्थता या सर्वसुलभता के पक्ष में हैं, पर इंटरनेट के सर्वसुलभ चरित्र को समाप्त कर सकनेवाले इंटरनेट डॉट ओआरजी को आगे बढ़ाने के लिए दलीलें भी पेश करते हैं. इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझना होगा कि वे गूगल, फेसबुक और माइक्रोसॉफ्ट को भारत में उद्यमिता की नयी लहर पैदा करने का ठेका नहीं दे सकते. उद्यमिता की नयी लहर इन स्थापित नामों को चुनौती देने वाले ही लायेंगे.
वह अगली चुनौती सिलिकन वैली में ही पैदा होगी, या बेंगलुरु, गुड़गांव, नोएडा जैसे किसी भारतीय शहर में, यह इस पर निर्भर है कि भारत में नवांकुर उद्यमों के लिए अनुकूल परिवेश किस हद तक बन पाता है. वैसा अनुकूल परिवेश ये स्थापित विशालकाय बहुराष्ट्रीय नाम खुद तो पैदा नहीं करेंगे, क्योंकि कोई खुद अपने लिए चुनौती के बीज नहीं बोता.
अगर प्रधानमंत्री चाहते हैं कि भारत में गूगल की अगली चुनौती पैदा हो, तो उन्हें प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उच्च शिक्षा और शोध-अनुसंधान को आकर्षक बनाना होगा. आज इंजीनियरिंग के छात्र बीटेक पूरा करते ही नौकरियों की कतार में लग जाते हैं. भला कितने इंजीनियरिंग छात्र एमटेक और रिसर्च की ओर बढ़ना चाहते हैं? एमटेक करने वाले छात्रों को इंजीनियरिंग कॉलेजों में ही चिढ़ाया जाता है.
माना तो यह भी जाता है कि एमटेक कर चुके छात्रों के लिए नौकरियों के अवसर बीटेक छात्रों की तुलना में कम हो जाते हैं. इंजीनियरिंग में रिसर्च करनेवालों को तो नाकारा ही माना जाता है. पर, लैरी पेज और सर्जेई ब्रिन ने जब गूगल बनाया, उस समय वे दोनों स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे थे. इस उच्च शिक्षा ने ही उन्हें वह काबिलियत दी, जिससे वे तब उपलब्ध सर्च इंजनों के मुकाबले बहुत ज्यादा प्रभावी सर्च एल्गोरिदम बना सके.
आज देश के आइआइटी या जितने भी प्रौद्योगिकी शिक्षा संस्थान हैं, वे केवल कुशल प्रबंधक और सफेद कॉलर वाले श्रमिक पैदा करने के कारखाने बन गये हैं. हम जिस आइटी और सॉफ्टवेयर क्षेत्र में भारत की प्रगति को लेकर गौरवान्वित महसूस करते हैं, वहां भी हम दूसरों के लिए ठेके पर सेवाएं देने का काम ही करते हैं. भारत ने कोई ऐप्पल या माइक्रोसॉफ्ट नहीं बनाया. सुंदर पिचाई गूगल के सीइओ बन सकते हैं, पर इंतजार इस बात का है कि कोई सुंदर पिचाई अपने उद्यम से गूगल का विकल्प खड़ा कर दे.
