एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के सार्वजनिक जीवन में किन्हीं दो व्यक्तियों, समुदायों या संस्थाओं की राय का न मिलना बुरी बात नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के सेहतमंद होने की जरूरी शर्त है. असहमति तर्क-वितर्क और प्रतितर्क की मांग करती है, ताकि युक्तियुक्त ढंग से साझे जीवन के लिए एक सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके. लेकिन, तर्क-वितर्क की जगह किसी को सीधे-सीधे राष्ट्रविरोधी ठहराने की मिसाल अब आये दिन सुनने को मिल रही है.
नयी मिसाल एक सांस्कृतिक संगठन के मुखपत्र की है, जिसने देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय को ‘राष्ट्रविरोधियों का अड्डा’ बताया है. कोई आपकी बातों से असहमत हो तो उसे राष्ट्रविरोधी बता कर भ्रम फैलाना राष्ट्रहित में ठीक नहीं है. इसे देश के सामाजिक माहौल में पिछले कुछ समय से घुल रही असहिष्णुता की चर्चा से ही जोड़ कर देखा जाना चाहिए, जो सरकार के दावों के बावजूद मंद पड़ने का नाम नहीं ले रही. समाज के एक कोने से शोर थमता नहीं, कि दूसरे कोने से उठने लगता है.
हमें नहीं भूलना चाहिए कि साझेपन की विराट कल्पना का ही नाम है राष्ट्रीयता. साझेपन की इस कल्पना को बनाया रखने का दस्तूर उस वक्त से चला आ रहा है, जबसे राष्ट्र-राज्यों के अस्तित्व की नींव पड़ी. दस्तूर यह है कि किसी से दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए.
राष्ट्र सरीखे विशाल जनसमुदाय के भीतर हरेक का दिल हरेक से हर घड़ी मिले तो यह एक आदर्श बात होगी, लेकिन किसी भी राष्ट्र के इतिहास में ऐसी घड़ी आज तक नहीं आयी, यह भी एक सच्चाई है. इस संभावना को स्वीकार करके कि किसी से दिल न मिलने के बावजूद हाथ मिलाया जा सकता है, दुनिया के ज्यादातर राष्ट्रों ने अपने को एक और अखंड रखा है और यही उनकी ताकत तथा संप्रभुता का राज भी है. दिल न मिलने के बावजूद किसी से हाथ मिलाना एक खास मनोदशा में ही संभव है.
यह भिन्नता को स्वीकार करने की मनोदशा है, जो सिखाती है कि राष्ट्रहित के मसले पर किसी के विचार भिन्न हो सकते हैं, उसकी बोलचाल, पहनावा और भोजन भिन्न हो सकता है और इस भिन्नता के बावजूद वह समान रूप से राष्ट्रप्रेमी हो सकता है, क्योंकि वह भी समान रूप से उसी विधि से बंधा है जिस विधि से आचार-विचार में उससे अलग राय रखनेवाला व्यक्ति. भिन्नता को स्वीकार करने की मनोदशा जब-जब कमजोर पड़ती है, राष्ट्र कमजोर पड़ता है.
