आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
मैं समझता हूं कि यह सवाल हमारे वक्त के सबसे बड़े रहस्यों में शुमार होना चाहिए कि हम भारतीय क्यों क्रिकेट जगत में दबदबा कायम नहीं कर पाते हैं. मेरा मतलब कभी-कभार की जीतों से नहीं है, मैं इसमें उस स्थायी धाक की बातें कर रहा हूं, जिस पर कभी वेस्ट इंडीज और ऑस्ट्रेलिया की मिल्कियत थी.
हमारे पास एक ऐसा क्रिकेट क्लब है, जो मोटे तौर पर दुनिया में सबसे धनीमानी है. इसलिए संसाधनों की कमी में हमारी विफलता की वजहें नहीं ढूंढ़ी जा सकतीं. हम तो इस खेल के एक-एक आर्थिक पहलू पर इस सीमा तक हावी हैं कि दुनिया के बाकी सारे बोर्ड हमारे पिछलग्गू बनने को बाध्य हैं.
इंडियन प्रीमियर लीग आज क्रिकेट का सबसे ज्यादा मुनाफा देनेवाला कार्यक्रम बन चुका है. और फिर भारत का प्रभाव केवल इसके बोर्ड-सदस्यों तक ही सीमित नहीं है. दुनिया के किसी भी कोने में क्रिकेट का कोई भी मैच खेला जाये, उसमें मोटर साइकिलों से लेकर पान मसाले तक भारतीय कंपनियों के विज्ञापनों की भरमार रहती है. तो फिर खेल पर हम क्यों हावी नहीं हो पाते?
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टेस्ट मैच में जहां हम 124 मैच जीते हैं, वहीं हारे हुए मैचों की संख्या 157 है. हममें घरेलू मैदानों पर ही बेहतर खेल का प्रदर्शन कर पाने की प्रवृत्ति है, जहां के धीमे विकेटों पर हमारे खिलाड़ी को आउट कर पाना विपक्षी टीम के लिए मुश्किल हुआ करता है.
तेज विकेटों पर हम जल्दी आउट होकर हारने की ओर उन्मुख हो जाते हैं. विश्व में क्रिकेट खेलनेवाले सभी प्रमुख देशों से हमने हारने के ही कीर्तिमान क्यों बना रखे हैं? ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध हमने जहां 40 मैच हारे हैं, वहीं 24 में ही फतह हासिल कर सके हैं. इंग्लैंड के साथ हम 43 मैचों में पराजय का मुंह देख कर केवल 21 मैच ही जीत सके हैं. वेस्ट इंडीज के साथ भी हम 30 मैच हार कर सिर्फ 16 मैचों में जीत दर्ज करा सके हैं. यहां तक कि पाकिस्तान के विरुद्ध भी हम 12 मैच हार कर 9 में ही कामयाब हो सके हैं.
हमें इसके लिए ईश्वर का शुक्रगुजार होना चाहिए कि अभी हम पाकिस्तान के साथ नहीं खेल रहे, वरना भावनात्मक रूप से आवेशित वर्तमान माहौल में उससे मिली हार हमारे लिए और अधिक असहनीय बन जाती. दक्षिण अफ्रीका केवल दो दशकों से ही मुकम्मल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल पा रहा है, मगर उसके विरुद्ध भी हमें सिर्फ सात मैचों में ही कामयाबी हासिल हुई है, जबकि हमने 13 मैच गंवाये हैं. श्रीलंका तथा न्यूजीलैंड ही ऐसे दो देश हैं, जिनकी टीमों के साथ खेलते हुए हम शिकस्त से ज्यादा फतह हासिल कर सके हैं.
श्रीलंका के विरुद्ध हम सात मैच हार कर 16 में जीत दर्ज करा सके हैं, जबकि न्यूजीलैंड के साथ हम 10 मैचों में पराजय का मुंह देख 18 में विजय प्राप्त कर चुके हैं.
एक दिनी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भी हालात कोई अधिक अच्छे नहीं हैं और इस मोरचे के आंकड़ों के साथ मैं आपको और अधिक उबाना अथवा उदास करना नहीं चाहता. इन आंकड़ों के तटस्थ विश्लेषण से हम कुछ अजीबोगरीब निष्कर्ष पर पहुंचते हैं. क्रिकेट मैचों के दौरान भारतीयों द्वारा प्रदर्शित उग्र राष्ट्रीयता और भावावेश हमारी टीम के वास्तविक प्रदर्शन में नहीं झलक पाते हैं.
यहां स्वभावतः सवाल यह उठता है कि क्रिकेट के खेल में हम अपना दबदबा क्यों कायम नहीं कर सके, जबकि सिर्फ यही एक खेल ऐसा है, जिसमें हम भारतीय वास्तविक दिलचस्पी लिया करते हैं? सवा अरब की हमारी जनसंख्या का अधिकांश न तो दूसरे किसी खेल को देखने में दिलचस्पी रखता है, न ही उसे खेलता है. ऑस्ट्रेलिया में महज ढाई करोड़ लोग रहते हैं, लेकिन वे क्रिकेट को अपने एकमात्र खेल के रूप में नहीं लिया करते.
यदि क्रिकेट खेलनेवाले सभी देशों की आबादी जोड़ दी जाये, तो भी वे भारत की आधी आबादी की बराबरी नहीं कर सकते हैं. इसलिए, हमारे देश को उपयुक्त स्तर की प्रतिभा की कमी से ग्रस्त भी नहीं होना चाहिए था. फिर भी, आइपीएल के विस्तार के रास्ते की एक प्रमुख बाधा तो यही है कि टीमों में शामिल होने योग्य स्थानीय प्रतिभा नहीं मिल पाती है. यही वजह है कि कुछ ही स्थानीय खिलाड़ी बड़ी रकम हासिल कर पाते हैं.
इसमें मांग की अधिकता नहीं, आपूर्ति की कमी झलकती है. हमारे पास जितनी बड़ी आबादी है, उसमें तो ऑस्ट्रेलियाई स्तर की 50 टीमें खड़ी हो जानी चाहिए, जबकि सच्चाई यह है कि हमारे पास वैसी एक भी टीम न तो अभी है, न ही पहले कभी थी. आखिर ऐसा क्यों है?
यह केवल धीमी अथवा तेज विकेटों का मामला नहीं हो सकता है. यदि यह वैसा है भी, तो क्यों अपने खिलाड़ियों को हम तेज विकेटों का सामना करने में प्रशिक्षित नहीं कर सकते? हमारे पास जितना बड़ा कोष मौजूद है, उससे तो हम अपनी टीम को जैसा भी प्रशिक्षण दिलाना चाहें, उन्हें तत्काल दिला सकते हैं.
तो फिर हम वैसा करते क्यों नहीं? इस तरह प्रशिक्षण, उपकरणों अथवा सुविधाओं की कमी कोई मुद्दा है ही नहीं. बहुत सारे पाठक मेरे साथ जिस बिंदु पर सहमत होंगे, वह यह है कि इन प्रश्नों का उत्तर इन मुद्दों से कहीं अधिक गहराई में स्थित है.
संभवतः उसका संबंध महत्वाकांक्षा तथा उत्कृष्टता के प्रति हमारी बेरुखी से है. हम किसी भी चीज में इस विश्व का नेतृत्व नहीं करते, और शायद यही वजह है कि हम इस खेल में भी इसका नेतृत्व करने से वंचित हैं. दरअसल, व्यक्तियों के रूप में ‘उत्कृष्टता’ में हमारा निवेश ही काफी कम है.
ऑस्ट्रेलिया, वेस्ट इंडीज या अभी भ्रमण कर रही दक्षिण अफ्रीकी टीम के विरुद्ध हमारे प्रदर्शन पर बस एक निगाह डालिये, आप समझ लेंगे कि हमारे साथ बहुत ही गड़बड़ िकया अलग जैसा मामला है. जहां विपक्षी टीम के सदस्य आपको एथलीटों की तरह फिट नजर आयेंगे, वहीं आप भारतीय टीम के कई खिलाड़ियों को थुलथुलेपन के शिकार अथवा अनफिट होते हुए भी राष्ट्रीय टीम में पहुंचने में कामयाब होते देखते हैं. हमारे लिए ‘उत्कृष्ट’ होने के बजाय ‘कामचलाऊ’ रूप से अच्छा होना ही पर्याप्त है.
इस लेख की शुरुआत मैंने यह कहते हुए की थी कि क्रिकेट में हमारे दबदबे की कमी हमारे समय के महान रहस्यों में एक होनी चाहिए, मगर यह वैसी हरगिज नहीं है. गहराई से यह सोचे बगैर कि वस्तुतः क्यों हम इस खेल में इतने बदतर हैं? करोड़ों की तादाद में हमारा इसे खेलते हुए देखना और इसे अरबों रुपये देना लगातार जारी है.
(अनुवाद : विजय नंदन)
