नेता तो नेता, जनता भी कम नहीं

नेता ​और साहित्यकार ​आदि ​आखिर इंसान ही तो हैं. वे कोई ​खुदा तो नहीं, जो कोई गलतियां न करें. आज ये लोग वोट​, शोहरत ​और शक्ति ​के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. सभी अपने मतलब के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं. राजनीतिक दलों के कर्ताधर्ता तो नेताओं को गलत बयानी पर डांट पिला​​ते […]

नेता ​और साहित्यकार ​आदि ​आखिर इंसान ही तो हैं. वे कोई ​खुदा तो नहीं, जो कोई गलतियां न करें. आज ये लोग वोट​, शोहरत ​और शक्ति ​के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. सभी अपने मतलब के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं.
राजनीतिक दलों के कर्ताधर्ता तो नेताओं को गलत बयानी पर डांट पिला​​ते हैं, मगर खुद पर नियंत्रण नहीं रखते. जात-पात, धर्म और आरक्षण आदि का खूब जहर घोला जा रहा है. आज शासक और शासित की जंग सबके सामने है.
देखना यह है कि कौन ​किसे धूल चटाता है. प्राय: लोग कहते हैं कि खरबूजे और चाकू की जंग ​में तो बेचारे खरबूजे को ही कटना पड़ता है. जनजागृति के कारण बिहार में भी जनता को एक ​और नयी जंग देखने को मिल ​सकती है. सवाल यह है कि जब देश के नेता यहां के लोगों को आपस में लड़ा सकते हैं, तो फिर यहां की जनता नेताओं को आपस में क्यों नहीं भिड़ा सकती.
-वेद मामूरपुर , नरेला

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