धर्म का इनकार नहीं सेक्युलरिज्म

विश्वनाथ सचदेव वरिष्ठ पत्रकार उस दिन मुंबई के प्रसिद्ध केसी कॉलेज हॉल के सामने पहुंचा, तो चौंक-सा गया. पुलिस की गाड़ी खड़ी थी और कॉलेज से लेकर हॉल के दरवाजे तक बीसियों पुलिस वाले थे. हॉल में प्रवेश से पहले सुरक्षा-जांच की विशेष व्यवस्था थी. यह सब देख कर लगा, ‘दूध का जला छाछ को […]

विश्वनाथ सचदेव

वरिष्ठ पत्रकार

उस दिन मुंबई के प्रसिद्ध केसी कॉलेज हॉल के सामने पहुंचा, तो चौंक-सा गया. पुलिस की गाड़ी खड़ी थी और कॉलेज से लेकर हॉल के दरवाजे तक बीसियों पुलिस वाले थे. हॉल में प्रवेश से पहले सुरक्षा-जांच की विशेष व्यवस्था थी. यह सब देख कर लगा, ‘दूध का जला छाछ को फूंक-फूंक कर पीता है’ वाली कहावत सिद्ध हो रही थी.

कुछ ही दिन पहले सुधींद्र कुलकर्णी के मुंह पर कालिख पोतने की घटना को देखते हुए पुलिस का अतिरिक्त सावधानी बरतना समझ में आता है. पुलिस के पास कुछ खुफिया सूचना हो सकती है, पर यह बात सहज समझ नहीं आती कि जानी-मानी इतिहासकार डाॅ रोमिला थापर के सेक्युलरिज्म जैसे विषय पर होनेवाले भाषण से किसी को क्या विरोध हो सकता है, या किसी को क्या खतरा हो सकता है? आश्चर्य है! पर इससे बड़ा आश्चर्य हॉल के भीतर पहुंच कर हुआ.

हॉल पूरा भरा हुआ था. यह एक सुखद आश्चर्य की बात थी कि रोमिला थापर जैसी विद्वान के भाषण को सुनने के लिए मुंबई वाले इतनी बड़ी संख्या में पहुंचे थे.

डॉ थापर ने लगभग एक घंटे भाषण दिया. पूरी गंभीरता के साथ एक गंभीर विषय पर कुछ समझानेवाले अध्यापकीय अंदाज में था उनका भाषण. उसी गंभीरता के साथ लोग सुन भी रहे थे. पूरे भाषण में कोई व्यवधान नहीं, एक भी मोबाइल नहीं बजा था. लगता है सबने अपने मोबाइल स्वयं बंद कर लिये थे. जैसा मैंने किया था. सब सुनना चाहते थे कि स्वर्गीय डाॅ असगर अली इंजीनियर द्वारा स्थापित संस्था ‘सेंटर फॉर दि स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म’ द्वारा उन्हीं की याद में आयोजित इस कार्यक्रम में विद्वान वक्ता क्या कहती हैं.

और डाॅ थापर ने जो कहा, वह वर्तमान भारत की स्थितियों और पनपती प्रवृत्तियों में एक चेतावनी जैसा था. उन्होंने प्रारंभ में ही स्पष्ट कर दिया था कि वे सांप्रदायिकता और कथित धर्म के संदर्भ में आज जो कुछ देश में हो रहा है, उस पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगी. डाॅ थापर ने बड़ी स्पष्टता के साथ यह बात रेखांकित की कि धर्म-निरपेक्षता विभिन्न धर्मों के सहअस्तित्व से कहीं आगे जाती है. उन्होंने कहा कि ‘सेक्युलरिज्म का मतलब धर्म का इनकार नहीं है, बल्कि सामाजिक संस्थाओं एवं कानूनों पर धर्म के नियंत्रण को कम करना है.’

आज जिस तरह की स्थितियां देश में बन रही हैं, बनायी जा रही हैं कहना ज्यादा सही होगा, उससे प्रबुद्ध नागरिकों का चिंतित होना स्वाभाविक है. सांप्रदायिकता की आग को हवा देने की कोशिशें हो रही हैं. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की चेतावनियों के बावजूद सत्तारूढ़ पक्ष से जुड़े व्यक्ति बिना किसी संकोच के कह रहे हैं कि ‘यह संघ की विचारधारा है, यह सत्तारूढ़ विचारधारा है, और यह ऐसी ही रहेगी.’

यह भाषा जनतंत्र की भाषा नहीं है. विवेकहीनता भी झलकती है इस भाषा में. पर सवाल भाषा से कहीं अधिक उसके पीछे की सोच का है. सवा अरब की आबादी वाला हमारा भारत विभिन्न धर्मों, विभिन्न जातियों, विभिन्न समूहों का एक सुंदर गुलदस्ता है. विभिन्नता में एकता वाली बात आज कुछ लोगों को भले ही एक जुमला लगने लगी हो, पर हकीकत यह है कि यह विभिन्नता हमारी ताकत है.

हमें इस ताकत को समझना भी है और एक बेहतर कल के लिए इसका उपयोग भी करना है. सेक्युलरिज्म का मतलब धर्म-विहीनता नहीं है. धर्म को सही अर्थों में समझना और सिर्फ अपनी ही नहीं, सबकी बेहतरी के लिए उसे काम में लेना इसका मतलब है. सहअस्तित्व को विवशता नहीं, एक अवसर के रूप में लेंö- साथ मिल कर बेहतर जिंदगी जीने का अवसर. यही अवसर हमें यह भी सिखाता है कि हम ‘मैं’ और ‘वह’ की भाषा से उबरें. मैं और वह नहीं ‘हम’ का अहसास ही सेक्युलरिज्म को सही अर्थ देता है.

लगभग 15 साल पहले नार्वे में वर्ण भेद में विश्वास करनेवाले दो व्यक्तियों ने एक अश्वेत की हत्या कर दी थी. सारा देश स्तब्ध रह गया. दूसरे ही दिन नार्वे की राजधानी ओस्लो की सड़कों पर क्षुब्ध नागरिकों का विशाल प्रदर्शन हुआ था, जिसका नेतृत्व कर रहे थे वहां के प्रधानमंत्री! साझे इतिहास और साझी संस्कृति वाले भारत में आज ऐसे ही नेतृत्व की जरूरत है.

हमारा दुर्भाग्य यह है कि विभिन्न धर्मों, जातियों, वर्गों, राजनीतिक पार्टियों में बंटा हमारा नेतृत्व जोड़ने की नहीं, बांटने की नीति में विश्वास कर रहा है. हमें अब जरूरत है सब धर्मों को स्वीकारते हुए मनुष्य धर्म को अंगीकार करने की. लेकिन क्या यह शर्म की बात नहीं है कि सेक्युलरिज्म की बात करने के लिए हमें बीसियों पुलिस वाले तैनात करने पड़ते हैं?

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