‘लोकतंत्र में सरकार का पहला कर्तव्य है कि वह देश में कानून के शासन को बरकरार रखे और नागरिकों की विभाजनकारी तत्वों से सुरक्षा करे. अदालतों को ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाना चाहिए, जिनमें घृणा के चलते किसी को पीड़ित किया गया हो.’ यह कहना है देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एचएल दत्तू का.
देश में बीते कुछ महीनों से अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ हिंसा तथा लेखकों-साहित्यकारों पर हमले की घटनाओं में खतरनाक तेजी के मद्देनजर उनकी यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी इस हिंसक प्रवृत्ति पर चिंता जता चुके हैं कि ‘हमारी संवैधानिक राज-व्यवस्था और सामाजिक जीवन का आधार-सूत्र ‘विविधता में एकता’ है, लेकिन आज इसके विखंडन का खतरा मंडराता दिख रहा है.’
लेकिन, दुर्भाग्य की बात है कि समाज में घृणा और भेदभाव का वातावरण बनानेवाले तत्वों पर सरकारें न सिर्फ काबू पाने में असफल हैं, बल्कि सत्ता से जुड़े कई लोग भी भड़काने की कार्रवाइयों में संलग्न हैं. सरकारें और पार्टियां जिम्मेवारियों को ईमानदारी से निभाने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप के पुराने ढर्रे पर चलते हुए राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगी दिख रही हैं. ऐसे में भारत के समृद्ध और आधुनिक राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरने की संभावनाएं धूमिल हो सकती हैं. अस्थिर माहौल में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को सुचारु रूप से चला पाना संभव नहीं होता.
ऐसे माहौल में आम नागरिकों, विशेष रूप से वंचित और कमजोर वर्ग सेसंबद्ध लोगों, के मौलिक अधिकार भी बाधित होते हैं. सामाजिक तनाव कारोबारों को फलने-फूलने में सबसे बड़ी बाधा पैदा करते हैं. यदि देश में आये दिन दंगों, भीड़ द्वारा हिंसक हमलों और जहर उगलती बयानों का सिलसिला जारी रहा, तो किसी भी निवेशक को हिचक होगी.
अगर मौजूदा हालात को बहुत जल्दी काबू में नहीं लाया गया, तो विकास की तमाम कोशिशें और उम्मीदें बेकार हो जायेंगी. जब तक अलग-अलग जातियों, क्षेत्रों और धर्मों के लोग एक साथ मिल-जुल कर सद्भाव के साथ उद्यमरत नहीं होंगे, हम गरीबी और बेरोजगारी का समाधान नहीं कर सकेंगे और विकास किसी मरीचिका की तरह हमसे दूर ही रहेगा.
टूट जाने के बाद सामाजिक ताने-बाने को फिर से जोड़ना मुश्किल होता है. उम्मीद है कि राष्ट्रपति और प्रधान न्यायाधीश का संदेश सरकार और समाज तक पहुंचेगा और हम जल्द ही विद्वेष के दमघोटू माहौल से बाहर निकलेंगे.
