झारखंड अकूत संपदाओंवाला प्रदेश है. इसकी कोख में कूट-कूट कर रत्न भरे पड़े हैं. इसके बावजूद विडंबना यह है कि यहां की जनता अनेकानेक समस्याओं से जूझ रही है. वह समस्याओं से ही काफी दुखी है.
दो जून की रोटी पाने के लिए यहां के नौजवानों को अन्य प्रदेशों में पलायन करना पड़ रहा है. रोजगार की अपार संभावनाओं के बीच शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और लोगों का पलायन करना सबसे बड़ी चिंता का विषय है. बेरोजगारों को समुचित रोजगार के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं. यह सरकार और राजनीतिज्ञों की कमजोर इच्छाशक्ति को दर्शाता है.
राज्य की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां के लोगों को बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, परिवहन, सुलभ बाजार और प्रशासनिक सुविधाओं के लिए जूझना पड़ रहा है.
लोगों का दर्द तब और बढ़ जाता है, जब लोगों को प्रखंड अथवा जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए यातायात और परिवहन आदि समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. इस बीच सवाल यह भी पैदा होता है कि आखिर इस प्रकार के हालात पैदा करने के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या आम अवाम ने एक बहुमत की सरकार को चुन कर भारी भूल की है? यदि नहीं, तो सरकार को आम अवाम की समस्याओं के प्रति सचेत होना होगा.
आज जरूरत इस बात की नहीं है कि सरकार यहां के लोगों को विकास का सपना दिखाये, बल्कि जरूरत इस बात की है कि सरकार जमीनी स्तर पर लोगों को सुविधाएं उपलब्ध कराये. इसके लिए सरकार को सबसे पहले निचले स्तर की गड़बड़ियों को दूर करना होगा. उसे बेरोजगारों को समान और समुचित रोजगार के साधन उपलब्ध कराने होंगे.
-बैजनाथ प्रसाद महतो, हुरलुंग, बोकारो
