ब्रजेश झा
अर्थशास्त्री
आज हमारे देश की सबसे बड़ी चुनौती विकास और बेरोजगारी से जुड़ी है. हालांकि, पिछले कुछ दशकों से विकास की बात राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में है, फिर भी इन दोनों मोर्चों पर हम अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाये हैं. दिक्कत यह है कि इस चुनौती से निपटने का हमारा लक्ष्य शॉर्ट टर्म का होता है, जबकि तीव्र विकास और बेरोजगारी दूर करने के लिए हमें कारगर लॉन्ग टर्म प्लान पर फोकस करना चाहिए.
दरअसल, विकास की बातों और दावों के दौरान यह नहीं देखा जाता कि वह ‘विकास’ कहां से आ रहा है और वास्तव में उसे कहां से आना चाहिए.
यह समझने की जरूरत नहीं समझी जाती कि विकास विकास गांवों-कस्बों से आया है या केवल महानगरों से. हमारे ग्रोथ सेंटर देशभर के छोटे शहरों-कस्बों में होने चाहिए, जबकि यह कुछ महानगरों तक सीमित है. इसलिए आमदनी के मामले में महानगरों और गांवों के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है. एक किसान की आमदनी बेहद कम है, जबकि आइटी क्षेत्र में काम करनेवालों की बहुत ज्यादा.
उदारीकरण की नीतियों को अपनाने के बाद 1995-97 से जीडीपी आधारित ग्रोथ पर ज्यादा फोकस किया गया है, लेकिन इसे नहीं समझा गया कि यह ग्रोथ कहां से आ रहा है. यही कारण है कि आज हम ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच फर्क की बात करते हैं. देश के समग्र विकास के लिए जरूरी है कि अब विकास का फोकस कस्बों और गांवों की ओर मुड़े. हालांकि, केंद्र सरकार ने इसे कुछ हद तक समझा है और बहुत से छोटे शहरों के विकास की बात हो रही है. लेकिन, इस मामले में पार्टियों के स्तर पर सोच व नीतियों का फर्क साफ देखा जा रहा है.
कांग्रेस व वाम दलों का मानना है कि पहले गरीबी दूर करने की नीतियों के जरिये गरीबों को समृद्ध बनाया जाये, फिर विकास की बात हो. लेकिन, अरविंद पनगड़िया और जगदीश भगवती सरीखे भाजपा के आर्थिक नीतिकारों का मानना है कि पहले विकास कार्यों को अंजाम दिया जाये और उसके परिणामस्वरूप आनेवाले करों के पैसे से गरीबी दूर की जाये.
देश में सामाजिक सुरक्षा का ढांचा सुदृढ़ नहीं है. करीब 94 फीसदी लोग असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. इन क्षेत्रों में काम करनेवालों के लिए जरूरी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. फिर भी सोशल सेक्टर को नजरअंदाज किया जा रहा है. इससे समग्र विकास मुमकिन नहीं.
देश में बहस अमूमन इस बात पर होती है कि सरकार द्वारा किसी खास क्षेत्र में कितनी रकम आवंटित की गयी है. इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता कि जो आवंटन किया गया है, उसका कितना लाभ मिला है.
लेकिन, आम आदमी को इससे मतलब नहीं है कि सरकार ने किसी खास क्षेत्र को कितनी रकम आवंटित की है. वह देखता है कि उन पैसों से उसके लिए क्या हो रहा है. इसलिए हमें गौर करना होगा कि वह रकम खर्च कैसे की जा रही है. आम आदमी देखना चाहता है कि सरकार ने जो रकम आवंटित की है, उसमें उसके हिस्से कितना आया. इसलिए यह मूल्यांकन जरूरी है कि जो रकम आवंटित या खर्च की जा रही है, उससे ‘आउटकम’ क्या हो रहा है. क्या जिस उद्देश्य से रकम आवंटित की गयी है उसकी पूर्ति हो रही है?
गवर्नेंस के लिए सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार से निपटने की है. सरकारी टेंडर में नियमों की अवहेलना होती है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है. सबसे पहले टेंडर की प्रक्रिया को ठीक करना होगा.
देश के सरकारी अस्पतालों और स्कूलों में व्यवस्था सही नहीं है, क्योंकि इनके लिए होनेवाले आवंटन और खर्च पर ठीक से ध्यान नहीं दिया जाता है. रकम आवंटन से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसका सदुपयोग हो. अनाज गोदामों और वेयरहाउसों के लिए प्रत्येक वर्ष रकम आवंटित की जाती है, लेकिन अनाज भंडारण की समस्या का समाधान नहीं हो पाया है. आखिर क्या खामियां रही हैं?
पर्यावरण व प्रदूषण के संबंध में देश में एक नयी तरह की समस्या पैदा हो रही है, लेकिन उसकी गंभीरता को नहीं समझा जा रहा है. दरअसल, हमारे यहां सरकारें पांच साल के लिए चुन कर आती हैं. ऐसे में जलवायु परिवर्तन व पर्यावरण संबंधी सुधारों के लिए लॉन्ग टर्म विजन नहीं बनाया जाता.
आज भले ही इस चुनौती को नजरअंदाज किया जा रहा हो, लेकिन आनेवाले समय में यह भयावह साबित हो सकती है. किसी संभावित आपदा से निबटने के लिए हमारी क्षमता कहां तक विकसित हो पायी है, इसके बारे में भी भरोसे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता. इसके लिए जरूरी क्षमता विकसित करनी होगी.
(कन्हैया झा से बातचीत पर आधारित)
