लच्छेदार भाषणों के बीच विकास गुम

नब्बे के दशक में खून के बदले खून मांगने वाली बिहार की धरती ढाई दशक बाद क्या विधानसभा चुनाव में वोट के बदले विकास मांगेगी? क्या बिहार की जनता इस बार जात-पात से ऊपर उठ कर चुनाव करेगी? चुनावी मौसम को देखकर तो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी बिहार […]

नब्बे के दशक में खून के बदले खून मांगने वाली बिहार की धरती ढाई दशक बाद क्या विधानसभा चुनाव में वोट के बदले विकास मांगेगी? क्या बिहार की जनता इस बार जात-पात से ऊपर उठ कर चुनाव करेगी?
चुनावी मौसम को देखकर तो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि हर बार की तरह इस बार भी बिहार विधानसभा चुनाव जातीय समीकरण के ही इर्द-गिर्द घूम रहा है. पार्टियों की नजर जात-पात और बागी, वैरागी तथा वोटकटवा उम्मीदवारों पर ही टिकी है. मुख्य रूप से इस बार का चुनाव रोचक, मजेदार, लच्छेदार, लोकलुभावन भाषणों व दिलचस्प जुमलों पर टिका है.
हवाई उड़ानों के जरिये नेता राजनीतिक जमीन या गद्दी को दखल करने के लिए एड़ी-चोटी एक किये हुए हैं. विकास और सुशासन के नाम पर शुरू हुई राजनीति अचानक आरक्षण, जात-पात, गाय-बकरे पर आ टिकी. कुल मिला कर यह कि इस बार के चुनावों में नेताओं की जुबान से िवकास गायब हो गया है.
– अनुपम शुक्ला, ई-मेल से

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