मानसिक रोग पर ध्यान कब!

डॉ अनिल सेठी काउंसेलर एवं साइकोलॉजिस्ट हमारे देश में मेंटल इलनेस (मानसिक रोग) को बहुत हीन भावना से देखा जाता है. इसका कारण मेंटल हेल्थ के बारे में जानकारी का न होना है. अधिकतर लोग मानते हैं कि इसका कोई इलाज नहीं है. कुछ लोग रूढ़िवादिता के चलते झाड़फूंक के चक्कर में भी पड़ जाते […]

डॉ अनिल सेठी

काउंसेलर एवं साइकोलॉजिस्ट

हमारे देश में मेंटल इलनेस (मानसिक रोग) को बहुत हीन भावना से देखा जाता है. इसका कारण मेंटल हेल्थ के बारे में जानकारी का न होना है. अधिकतर लोग मानते हैं कि इसका कोई इलाज नहीं है. कुछ लोग रूढ़िवादिता के चलते झाड़फूंक के चक्कर में भी पड़ जाते हैं.

हमारा समाज आज इंटरनेट के जरिये जानकारियां पाने में लगा है, फिर भी मेंटल हेल्थ के क्षेत्र में बहुत अधिक प्रगति नहीं हो सकी है. आज विश्व मानसिक दिवस (वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे) है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस साल विश्व मानसिक दिवस की थीम रखी है- ‘डिग्निटी इन मेंटल हेल्थ’.

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, वर्ष 2020 तक डिप्रेशन सबसे बड़ी बीमारी बन जायेगी. आज 20 प्रतिशत बच्चे और 13 से 19 की उम्र के बच्चे मानसिक रोगों के शिकार होते हैं. लगभग 50 प्रतिशत मानसिक रोग 14 वर्ष की उम्र से पहले ही शुरू होते हैं. भारत में लगभग 30 करोड़ लोग मानसिक तनाव से ग्रस्त हैं.

अगर मानसिक रोग को शुरू में ही पहचान लिया जाये, तो काउंसलर और साइकोलॉजिस्ट के द्वारा बिना दवाई के ही यह आसानी से ठीक हो सकता है. लेकिन जब तक मानसिक रोग का पता चलता है, देर हो चुकी होती है. तब साइकेट्रिस्ट के पास स्ट्रांग दवाइयां देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस के अनुमान के अनुसार, हमारे देश में 12,000 साइकेट्रिस्ट की आवश्यकता है, तब जाकर इस बढ़ती हुई मानसिक रोगियों की संख्या पर कुछ काम हो सकता है, जबकि अभी तक सिर्फ 3,500 साइकेट्रिस्ट ही उपलब्ध है. इसके अनुसार 3 लाख लोगों पर एक साइकेट्रिस्ट उपलब्ध है, जबकि विश्व स्तर पर हर 8,000 लोगों पर एक साइकेट्रिस्ट उपलब्ध होना चाहिए.

अगर मानसिक रोग को शुरुआती लक्षणों से ही पहचान लिया जाये, तो काउंसेलिंग के द्वारा ही काबू पाया जा सकता है. मानसिक रोगों के कुछ लक्षण ये हैं- बहुत ज्यादा या बहुत कम सोना. बहुत ज्यादा या बहुत कम खाना. अकेले रहना और कम बातचीत करना. छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ाना. किसी काम में मन का ना लगना. बहुत खतरनाक ढंग से ड्राइविंग करना. बार-बार तालों को चेक करना. पानी की टोटी या गैस की नोब को बार-बार चेक करना. बार-बार हाथ धोना. बहुत अधिक सफाई पर ध्यान देना और दूसरों से लड़ना. ज्यादा स्मोकिंग या ड्रिंकिंग. गले, कंधे, छाती, गर्दन ,सर दर्द, पीठ आदि में दर्द या अजीब सी बैचैनी.

सांस का फूलना, पसीना आना. एक जगह टिक के न बैठना, बैचैन रहना. मानसिक रोगों से बचाने में ये आदतें मददगार हैं- नकारात्मक विचारों से दूर रहें. कुछ समय ऐसे लोगों के साथ गुजारें, जहां हंसना आसान हो. मेडिटेशन करें. रोजाना कुछ समय शारीरिक व्यायाम, योग, डांस आदि करें. कुछ समय सामाजिक कार्य करें. कुछ हॉबी जरूर अपनाएं- ड्राइंग, लिखना आदि. जंक फूड का सेवन ना करें, और हल्का भोजन करें. मधुर संगीत सुनें, आदि…

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