एसएमएस और ई-मेल के युग में हम पत्र लिखना बिल्कुल भूल ही गये हैं. हाथ से लिखा पत्र जब किसी को मिलता है, तो लिखनेवाला स्वयं उसके सामने आ जाता है. वह भाई-बहन, मां-भाभी, परिवार का सदस्य या फिर कोई मित्र ही हो, पत्र अपने साथ उसका चित्र लेकर आता है.
लिखनेवाले से जुडी यादें उन हाथ से लिखी पंक्तियों में होती हैं. आज का समय शायद भावनाओं और संवेदनाओं का नहीं है. घर के बाहर लगे लेटर बॉक्स किसी अपने के पत्र का इंतजार नहीं करते. उनके पास तो बिजली, टेलीफोन, मोबाइल के बिल या बीमा प्रीमियम के नोटिस आते हैं.
पोस्टकार्ड को एक दोस्त के रूप में देखा जाता था. आज उसकी कोई पहचान नहीं. उसे अनपढ़-गंवार के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है. पोस्टकार्ड विलुप्त ना हो जाये, इसलिए हम कुछ पुराने दोस्तों ने एक पहल की है. हम एक-दूसरे को पोस्टकार्ड लिखते हैं. आप भी अगर इस अभियान में शामिल हों, तभी बचेगा पोस्टकार्ड.
-चंदर धींगरा, कोलकाता
