विदेश में बसे भारतीयों का उत्साह

आकार पटेल कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया यह आलेख विदेश में बसे भारतीयों के बारे में है, जिन्हें हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों के दौरान पिछले 16 महीनों में खूब देखा है. ये वे लोग हैं, जो प्रधानमंत्री से मिलने-जुलने की अफरातफरी करते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे दौर के विलक्षण राजनेताओं में […]

आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
यह आलेख विदेश में बसे भारतीयों के बारे में है, जिन्हें हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरों के दौरान पिछले 16 महीनों में खूब देखा है. ये वे लोग हैं, जो प्रधानमंत्री से मिलने-जुलने की अफरातफरी करते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे दौर के विलक्षण राजनेताओं में हैं और उनसे पहले विदेश में रह रहे भारतीयों में कोई भी अन्य नेता उनसे अधिक लोकप्रिय नहीं रहा है.
अपने हर विदेश दौरे में उन्होंने बहुत बड़ी संख्या में वहां रह रहे भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के बीच स्वयं को पाया है- चीन में, अमेरिका में (जहां उन्होंने अधिक पढ़े-लिखे और समझदार भारतीयों को लोकप्रिय अमेरिकी टेलीविजन प्रोग्राम स्टार वार्स के एक संदर्भ- ‘मे द फोर्स बी विथ यू’ का प्रयोग कर भले ही शर्मिंदा किया हो), खाड़ी देश में और अन्य जगहों पर.
नरेंद्र मोदी के ऐसे सत्कार को हमारे देश के मीडिया ने चमकदार शब्दों में उल्लिखित किया है, जैसे कि रॉक स्टार की तरह स्वागत. लेकिन यहां हमें जरा ठहर कर यह भी सोचना चाहिए कि इसका मतलब क्या है? रॉक स्टारों की उन्मादी लोकप्रियता उनके करिश्माई व्यक्तित्व से आती है.
इसका आधार उनकी मानवता या उनके उत्कृष्ट गुण नहीं होते, बल्कि यह सब एक छद्म नायकत्व के आधार पर तैयार होता है, जो उनकी सार्वजनिक छवि से बनता है. यह सजावटी और दिखावटी लगाव है. यानी रॉक स्टार की छवि में ऐसा कुछ भी शामिल नहीं है, जिसकी चाह दुनिया के किसी भी गंभीर राजनेता को होनी चाहिए.
हम अति-प्रशंसा के विषय-वस्तु की चर्चा नहीं कर रहे हैं, लेकिन यह सही है कि नेताओं के भाषण या उनके काम में कुछ ऐसी भाव-भंगिमाएं भी शामिल होती हैं, जो इस तरह की अतिउत्साही प्रतिक्रियाएं पैदा करती हैं.
हम महात्मा गांधी को रॉक स्टार जैसी छवि की मिलने की कल्पना नहीं कर सकते हैं, और कभी उन्होंने ऐसी इच्छा भी नहीं रखी.
यह एक क्षणभंगुर और अस्थायी भावना भी है, और रॉक तथा फिल्म स्टारों के हिस्से में ऐसे दिन गिने-चुने होते हैं. बहरहाल, इस बात को यहीं विराम देते हैं. यहां विषय नरेंद्र मोदी नहीं हैं, बल्कि वे विदेशी भारतीय हैं, जो मोदी के साहचर्य की चाह रखते हैं. अब हम इस बात पर विचार करते हैं कि वे ऐसा क्यों करते हैं.
पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय दुनिया के अधिकतर देशों के लोगों की तुलना में अधिक राष्ट्रवादी होते हैं. जन्मभूमि के गीत सुनते हुए हम बहुत जल्दी भावुक हो जाते हैं. कई पीढ़ियों से पश्चिम में बसे भारतीय अब भी भारत के साथ लगाव रखते हैं और खेल आयोजनों में अपने मातृ देश के समर्थन में अच्छी खासी संख्या में उपस्थित होते हैं. उन मैचों में भी वे भारत का पक्ष लेते हैं, जिनमें प्रतिद्वंद्वी टीम उस देश की होती है, जो वर्तमान में उनका वास्तविक घर है.
दूसरा पहलू ग्लानि का भाव है. उदाहरण के लिए, भारत में सब्सिडी पर पढ़े डॉक्टरों और इंजीनियरों को लें जो पैसा कमाने के लिए विदेशों में जा बसे हैं. उनके लिए ऐसा करना स्वाभाविक है, पर ग्लानि का भाव अन्य लोगों में भी बरकरार रहता है. नरेंद्र मोदी के कार्यक्रमों, जहां राष्ट्रवाद अपने चरम पर होता है, में भाग लेकर उन्हें एक तरह का संतोष मिलता है कि वे अपने देश का समर्थन कर रहे हैं. इससे उनके अंदर कहीं गहरे छुपी हुई भावना तुष्ट होती है कि उन्होंने अपने देश को छोड़ दिया है.
भाग लेने की तीसरी प्रेरणा हीनता के बोध से आती है. उस भीड़ में एकता और उद्देश्य का भाव उनकी वास्तविक जिंदगी से अधिक महत्वपूर्ण होने का अहसास देती है. बड़ी संख्या में आप्रवासी भारतीयों के आयोजन में हिस्सेदारी उन्हें एक होने का भाव देती है.
उनमें से बहुत स्थानीय समाज में घुलने-मिलने में सक्षम नहीं हैं, विशेषकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से.
उदाहरण के लिए पटेलों को लें. पटेल आम तौर पर मोटेल व्यवसाय को क्यों पसंद करते हैं? हम इस क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों का बखान करते हैं, लेकिन इसी व्यवसाय को चुनने के कारणों का विश्लेषण नहीं करते.
मेरे कई रिश्तेदार इस व्यवसाय में हैं और मैं इस मसले पर कुछ अधिकार के साथ बोल सकता हूं. सच यह है कि मोटेल व्यवसाय में पटेलों को कैश काउंटर के अलावा अमेरिकियों से मिलने का अधिक मौका नहीं होता है. काउंटर पर बैठे पटेल के पीछे रसोई में कढ़ी उबलती रहती है और बैठक में टेलीविजन पर रामायण धारावाहिक का वीडियो चल रहा होता है.
विदेशों में बसे गुजराती आपस में ही मिलते-जुलते हैं और उनके स्थानीय मित्रों की संख्या बहुत ही कम होती है. पटेल किसी पर्व-त्योहार में दूसरे पटेल से मिल कर बहुत खुश होते हैं और वे सबसे अधिक खुश तब होते हैं, जब वे भारत कोई मंदिर बनाने या अपने पूज्य संतों से मिलने आते हैं. यह बात अन्य समुदायों पर भी लागू होती है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभाओं जैसे उच्च ऊर्जा के कार्यक्रम उनके एक साथ आने के स्वाभाविक मौके होते हैं.
अब सवाल यह उठता है कि इस ऊर्जा का परिणाम क्या है? इसका जवाब है- कुछ खास नहीं. जैसे कि रॉक स्टार के मंच से जाने के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हो जाता है, भीड़ अपनी एकता और अर्थ खो देती है. नरेंद्र मोदी की इन सभाओं और विदेशी देशियों की भीड़ के इन तमाशों का सच भी यही है कि ये कार्यक्रम और आयोजन महज मनोरंजन भर हैं.

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