अभी हमारा देश भुखमरी, गरीबी, भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद और साम्राज्यवाद से ग्रस्त है, तो लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, यातायात व परिवहन जैसी समस्याओं से रूबरू हो रहे हैं. इन समस्याओं से निजात पाने के लिए देश की जनता अपने स्तर पर जूझ रही है.
ऐसे में देश के एक माननीय केंद्रीय मंत्री द्वारा स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में किसी खास धर्म की पुस्तकों को शामिल करने का बयान देना कितना जायज है? क्या इस प्रकार का उनका बयान देश के लोगों को उद्वेलित करनेवाला नहीं है?
एक ओर देश के लोग पेट भरने की जुगत में हो और ऐसे में इस प्रकार की बात करने का क्या औचित्य है? यदि पाठ्यक्रम में धार्मिक पुस्तकों को शामिल करना इतना ही जरूरी है, तो सभी धर्मों की पुस्तकों को क्यों नहीं शामिल किया जाता?
बैजनाथ प्रसाद महतो, हुरलुंग, बोकारो
