आधुनिक समाज के वृद्ध अक्सर एकाकी जीवन जीते हुए पाये जा रहे हैं. उम्र ढलने के साथ ही माता-पिता खुद को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं. आज की युवापीढ़ी अपने माता-पिता को बोझ समझने लगे हैं.
देश और समाज के युवाओं को यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि जो व्यक्ति पूरे जीवन अपने चार बच्चों के साथ पूरा परिवार चला सकता है, तो क्या वह अपने जीवन को सुचारू ढंग से नहीं जी सकता. जी सकता है, लेकिन अक्सर वृद्धावस्था में लोगों को एक सहारे की जरूरत होती है, जिसे आज की युवा पीढ़ी पूरी नहीं कर पा रही है.
जैसे फलों से लदे वृक्ष अपने पौधों को देख कर दोगुने उत्साह से लहलहाने लगते हैं, वैसे ही आदमी भी अपनी संततियों के साथ रह कर ज्यादा खुशी महसूस करता है. आज के युवाओं को यह बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए. उन्हें उस वेदना को समझना होगा.
– मनोरमा सिंह, जमशेदपुर
