प्रीति चौधरी
स्वतंत्र लेखिका
कभी भी टीवी खोलिए, यदि धार्मिक चैनलों पर थोड़ी देर ठहर गये तो नैतिक उपदेशों की झड़ी लग जायेगी. सारे बाबा, संत, महात्मा दान-पुण्य की महिमा बखानते ही मिलेंगे. इनके भक्तों को देख कर या तो कोफ्त होती है या अपने समाज के चरित्र पर रोना आता है.
अभी हाल में बीते सावन महीने में, मां की इच्छा का ध्यान रख कर उन्हें लखनऊ के प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर ले गयी, तो लगातार होती एक उद्घोषणा ने ध्यान अपनी ओर खींच लिया. यह उद्घोषणा थी ‘सभी भक्तगण महिला पॉकेटमारों से सावधान रहें और जिन्हें भी दक्षिणा आदि देनी हो वे महंथ जी से संपर्क करें.’
ये दोनों ही घोषणाएं भक्तों की जेबों के लिए ही थीं. भोलेनाथ को जल चढ़ाने का आलम यह कि यदि पुलिस थोड़ी सी छूट दे तो भक्तगण एक-दूसरे को रौंदते हुए जलाभिषेक का पुण्य प्राप्त कर लें. ऐसे भक्तों पर हंस दो, तो भक्त जान लेने पर आमादा हो जायेंगे. इन मठों-गढ़ों पर ही तो लोगों के असली चेहरे सामने आते हैं.
मंदिरों में कदम-कदम पर रखी दान पेटिकाएं और मैकडॉनल्ड या केएफसी पर रखे डोनेशन के डिब्बे एक जैसे ही लगते हैं. एक जगह जनता (धर्म के उपभोक्ता) के पैसे से कुछ लोगों का बिना काम किये खर्चा चलता है, तो दूसरी जगह जनता (बाजार के उपभोक्ता) के पैसे से कॉरपोरेट रेस्पांसबिलिटी निभायी जाती है.
कुछ महीने पहले जब बुंदेलखंड से हर दिन किसानों के मरने की खबरें आ रही थीं, उसी दौरान झांसी में एक बहुत बड़े धर्मगुरु का कार्यक्रम था. पूरा झांसी शहर इनके स्वागत में लगी बड़ी-बड़ी होर्डिंग से पट गया था.
निवेदनकर्ताओं और स्वागत के इच्छुक लोगों में दिल्ली, कानपुर के बड़े व्यापारी तो थे ही, विभिन्न न्यायालयों के माननीय पूर्व न्यायाधीश और अवकाश प्राप्त नौकरशाह भी शामिल थे. शहर के सांसद और विधायक ने तो बकायदा अपने नाम के आगे ‘चरणसेवक’ लिख कर उस धर्मगुरु का स्वागत किया. हर दिन अखबारों में सत्संग की खबर छपती कि कैसे टैंकरों में देशी घी लाये गये हैं और भोग लग रहा है.
इसी धर्मगुरु की शहर में मौजूदगी को महसूस कर हमने सोचा कि क्यों न इनसे और इनके भक्तों से किसानों के लिए थोड़ी सहायता मांग लें. रोज आत्महत्या कर रहे किसानों की बेबसी बयान कर साधु महाराज से मदद मांगते हुए हमने उन्हें पत्र लिखा. ऐसी अपील उन दिनों हम सोशल मीडिया पर कर रहे थे और सिविल सोसाइटी के लोग इस मुद्दे पर हमारे साथ खड़े थे.
पर प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पहले तो धर्मगुरु ने नये चरणसेवक प्राप्त होने की उम्मीद में बड़े चाव से पत्र खोला, लेकिन पढ़ कर पत्र को किनारे रख मौन साध लिया. सवाल यह है कि इन कथित साधु-महात्माओं को अपने आसपास के कमजोरों और गरीबों के दुख-दर्द से कोई वास्ता क्यों नहीं है?
इनके चेले-चपाटी ज्यादातर पैसे वाले ताकतवर और रसूख वाले लोग तो हैं ही, गरीब भी टेलीविजन पर हनुमानजी की असली माला और अल्ला मियां की असली ताबीज का विज्ञापन देख कर खरीदने के जुगाड़ में लगा है. अब ऐसे बाजार के बीच हमें इसी धरती पर एक ‘पीके’ को पाना होगा, दूसरे ग्रह से उसके आने का इंतजार ठीक नहीं.
