राजनीति का यह खेल वर्षो पुराना है
इस मैदान में कोई दादा तो कोई नाना है
सत्ता की लड़ाई में भ्रष्टाचार का बोलबाला है
चारों ओर इसमें घोटाला-ही-घोटाला है
बड़े-बड़े वादे लेकर हर कोई आता है
कुछ ही दिनों में इस रंग में रंग जाता है
फिर वह वादे, वह दावे सब भूल जाता है
अपना-अपना भविष्य संवारने में लग जाता है
हर पांच साल बाढ़, फिर से यह खेल आम होता है
स्वच्छ भारत की कल्पना, कल्पना ही रह जाती है
सुंदर देश का सपना मात्र एक दिखावा है
जनता सोचती रह जाती है क्या फिर से कोई गांधी आ सकता है
– सुनंदा, सकरी, दरभंगा
