भारत में मोबाइल कनेक्शन की संख्या एक अरब के करीब हो चुकी है. इससे अधिक मोबाइल कनेक्शन सिर्फ चीन में (सवा अरब से अधिक) हैं. लेकिन उपभोक्ताओं की इतनी विशाल संख्या को मिल रही सेवाओं की गुणवत्ता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कॉल कुछ मिनट लंबी होते ही बीच में कट जाने (कॉल ड्रॉप) की शिकायतें आम हो गयी हैं.
इससे न सिर्फ उपभोक्ताओं को दोबारा कॉल के लिए अधिक पैसे देने पड़ रहे हैं, बल्कि उन्हें गैरजरूरी तनाव भी ङोलना पड़ रहा है. इस मामले में सरकार एवं कंपनियों बीच काफी समय से जारी आरोप-प्रत्यारोपों के बावजूद स्थिति में सुधार नहीं होता देख खुद प्रधानमंत्री को दखल देना पड़ा है.
उन्होंने एक उच्चस्तरीय बैठक में ‘कॉल ड्रॉप’ पर गंभीर चिंता जताते हुए अधिकारियों से पूछा है कि मामले में क्या कदम उठाये गये हैं. साथ ही उन्हें सुनिश्चित करने को कहा है कि ‘वॉयस कनेक्टिविटी’ की यह समस्या ‘डाटा कनेक्टिविटी’ तक न पहुंचे. दरअसल, समस्या के कुछ सूत्र प्रधानमंत्री के इस अंतिम निर्देश में भी छुपे हैं.
जानकारों का कहना है कि मोबाइल कंपनियों को डेटा सर्विस से अधिक आय हो रही है, इसलिए वे वॉयस सर्विस की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दे रहीं. साथ ही कई कंपनियां अब 4 जी तकनीक के प्रसार का इंतजार कर रही हैं, इसलिए पुरानी तकनीक में निवेश से परहेज कर रही हैं. हालांकि इस संदर्भ में कंपनियां सरकार पर कई आरोप मढ़ रही हैं, पर उनके ज्यादातर आरोप खोखले हैं.
मसलन, मोबाइल कंपनियों का कहना है कि उन्हें पर्याप्त स्पेक्ट्रम नहीं मिल रहा है, जबकि सरकार का पक्ष है कि कंपनियों को जो स्पेक्ट्रम दिया जा रहा है, वे उसे भी नहीं खरीद रहीं. वर्ष 2012 में जितना स्पेक्ट्रम ऑफर किया गया था, कंपनियों ने उसका 48 फीसदी ही खरीदा. इसी तरह 2013 में पेशकश का 20 फीसदी और 2014 में 81 फीसदी ही खरीदा. इस वर्ष भी 470.75 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम ऑफर किया गया, पर कंपनियों ने 418 मेगाहट्र्ज यानी 88 फीसदी की ही खरीद की है.
ट्राई की दिसंबर, 2014 में आयी एक रिपोर्ट के अनुसार, मोबाइल कंपनियों ने उपभोक्ताओं की संख्या तो बढ़ा ली है, पर वे इन्हें बेहतर सेवा देने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रर खड़ा करने में विफल रही हैं.
उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद, सरकार कंपनियों की जायज दिक्कतों पर गौर करते हुए इस समस्या का शीघ्र समाधान तलाश लेगी. कहने की जरूरत नहीं कि इस समस्या के रहते मोदी सरकार का ‘डिजिटल इंडिया’ का सपना अधूरा ही रह जायेगा.
