पूर्व सैनिकों की छीछालेदर न हो

पूर्व जनरल वीके सिंह ने कहा है कि ‘एक रैंक एक पेंशन’ (ओआरओपी) में कुछ पेचीदगियां हैं, जिन्हें ठीक कर इसे लागू किया जायेगा. पर यह काम कब तक हो जायेगा, इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा. उनके पहले प्रधानमंत्री और दूसरे कुछ केंद्रीय मंत्री भी यह बयान दे चुके हैं कि सरकार ओआरओपी […]

पूर्व जनरल वीके सिंह ने कहा है कि ‘एक रैंक एक पेंशन’ (ओआरओपी) में कुछ पेचीदगियां हैं, जिन्हें ठीक कर इसे लागू किया जायेगा. पर यह काम कब तक हो जायेगा, इस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा.
उनके पहले प्रधानमंत्री और दूसरे कुछ केंद्रीय मंत्री भी यह बयान दे चुके हैं कि सरकार ओआरओपी से सहमत है, पर इसे लागू करने में तकनीकी समस्याएं हैं. इस तरह के वक्तव्यों से भ्रम फैल रहा है और सेवानिवृत्त सैनिकों का आक्रोश भी बढ़ रहा है.
ओआरओपी का मतलब है एक ही रैंक से रिटायर होने वाले अफसरों को एक जैसी पेंशन. यानी 1980 में रिटायर हुए कर्नल को आज रिटायर हुए कर्नल के बराबर ही पेंशन दी जाये. इस योजना के लागू होने से 30 लाख सैन्यकर्मियों को फायदा होगा. जो रिटायर हो चुके हैं, उन्हें एरियर भी मिलेगा. यह मांग ’80 के दशक से ही उठायी जा रही है.
इससे सुप्रीम कोर्ट ने भी सहमति जतायी है. इसे लागू करने के वादे सभी सरकारें करती आयी हैं, लेकिन यह मांग आज तक पूरी नहीं हो पायी. इसे जिस तरह से भाजपा ने चुनावी मुद्दा बनाया था, उससे तो लगा कि बस सरकार के शपथ ग्रहण करने की देर है. लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी मोदी सरकार इसे लागू नहीं कर पा रही है. खुद सरकार के स्तर पर इसे लेकर असमंजस की स्थिति है.
वित्त मंत्रलय ने इस पर आपत्ति जतायी है. उसकी दलील है कि एक रैंक एक पेंशन से वित्तीय घाटे का आकलन बिगड़ जायेगा. साथ ही इसके अमल में आने से हर साल आर्थिक बोझ बढ़ता रहेगा. फिर सरकार को यह भी डर है कि इसे लागू करते ही दूसरे विभागों में इसे लागू करने की मांग न उठने लगे. बहरहाल, यह सैनिकों से जुड़ा मसला है, जिस पर सरकार को तुरंत कदम उठाने होंगे.
अनिल सक्सेना, जमशेदपुर

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