आलोक पुराणिक
चर्चित व्यंग्यकार
बाबाओं और बाबियों के ठिकाने बदल रहे हैं अब. पहले बाबा आश्रमों में मिलते थे, अब कई बड़े बाबा जेल में मिल रहे हैं, या जेल जाने की तैयारियों में लगे मिल रहे हैं. इनके रंग-ढंग बहुत ही बदल गये हैं.
कई बाबा छिछोरे-छेड़कों की तरह दिख रहे हैं, कई बाबियां किसी मेकअप कंपनी की ब्रांड अंबेसडर बनीं आशीर्वाद बांट रही हैं. एक तरह से देखें, तो मुल्क में अध्यात्म मुख्यधारा में आ रहा है. बाबा और बाबियां पब्लिक जैसी हुई जा रही हैं.
बाबा-बाबियां समाज से कटी हुई नहीं हैं अब. अब हो सकता है कि कोई बाबी किसी चेली से तंत्र-साधना के सूत्र शेयर ना करे, बल्कि यह पूछ बैठे सुन री सुनीता, तेरी लिपिस्टिक का शेड तो बहुत ही कूल लग रहा है.
मेरी लिपिस्टिक इतनी कूल नहीं लग रही ना. तेरी मिनी स्कर्ट बहुत अच्छी लग रही है, तू अपनी अगली यूरोप विजिट में मेरे लिए भी ऐसी मिनी-स्कर्ट ले आना. इसे पहन कर डांस करना मुङो बहुतै अच्छा लगता है.
बाबा-बाबियां अब पब्लिक के बहुतै करीब आ रही हैं. बाबा लोग आम पब्लिक की तरह सरकारी जमीन घेरने की मंशा रखने लगे हैं. इस तरह से बाबा आम पब्लिक के करीब आ रहे हैं.
आम आदमी और बाबा में इस मामले में फर्क नहीं रहा कि दोनों की ही इच्छा सरकारी प्रॉपर्टी को घेरने की होती है, पर बाबा सफलतापूर्वक घेर जाता है, आम आदमी घेर नहीं पाता है. एक जानकार बता रहे थे कि मुल्क के शीर्ष प्रॉपर्टी-धारकों में प्रॉपर्टी डीलर कंपनियों के अलावा वह बाबा भी हैं, जिन्होंने हर कायदे के खाली प्लॉट को धर्म से घेर लिया.
उधर बाबियां एकदम सरल-सहज जीवन का ज्ञान दे रही हैं, टॉप ब्रांड का मेकअप-ज्वैलरी लपेट कर. कुल मिला कर, यह कहा जा सकता है कि अब बाबा और बाबियां समाज की मुख्यधारा में आ रही हैं. इसलिए अब जरूरी हो गया कि बाबाओं और बाबियों को भी घेर-बांध के कंजूमर फोरम के दायरे में लाया जाये.
दरअसल, अब बाबागीरी और बाबीगीरी बाकायदा कारोबार ही है. बंदा दस हजार का टीवी ले, वह ढंग से काम ना करे, तो कंजूमर फोरम में जाकर कानूनी शिकायत की जा सकती है. पर बाबा-बाबी हजारों लेकर लॉकेट या आशीर्वाद चपेक दें, और कोई रिजल्ट ना आये, तो उसकी कहीं शिकायत ना होती.
मोबाइल-टीवी खराब हो जाये, तो कंजूमर अर्जी लेकर कंजूमर फोरम में जाता है, पर एक बाबा-बाबी से निराश होकर कष्टित कंजूमर खुशी-खुशी दूसरे किसी बाबा-बाबी के पास चला जाता है. मुल्क में बेवकूफों की तादाद बाबाओं-बाबियों के मुकाबले बहुतै ज्यादा है. प्रति बाबा कम से कम दस-दस लाख बेवकूफ हैं मुल्क में. जम कर रोजगार मिल रहा है, बाबा-बाबी स्किलवालों को.
अभी एक बाबीजी पर आरोप लग रहे हैं धोखाधड़ी वगैरह के, इनके चेलों में पुणो फिल्म इंस्टीट्यूट के चेयरमैन गजेंद्र चौहान और सुभाष घई भी हैं. चौहान साहब और घई साहब दोनों ही अपनी-अपनी फील्ड के अर्ध-बेरोजगार टाइप्स हैं, काहे का और कैसा आशीर्वाद बाबीजी का जी! अब तो पक्के तौर पर बाबाओं का कंज्यूमर फोरम बनता ही है.
