भारत को स्वाधीनता 1947 में मिली. लगभग दो सौ वर्षो तक ब्रिटिश कुव्यवस्था के अंतर्गत पल भर के चैन को तरस रहे तत्कालीन भारत के लगभग 40 करोड़ नागरिकों ने राहत भरी, गहरी व स्वतंत्र सांस ली थी.
आजादी सबको प्यारी होती है. सभी चाहते हैं कि स्वतंत्र परिवेश में नागरिक का दर्जा प्राप्त कर सरकार द्वारा प्रदत्त अधिकारों व सुख-सुविधाओं का लाभ उठा कर सुखमय जीवन के भागी बनें. आजादी और विभाजन के बाद दुर्भाग्यवश, सरकारी उपेक्षा के कारण भारत-बांग्लादेश सीमा पर रह रहे करीब 51 हजार लोग अनधिकृत बस्तियों में गुमनामी के अंधेरे में किसी चमत्कार की आस के सहारे बीते 68 वर्षो से अब तक फटेहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे.
ऐसी बस्तियों में निवास करना, जहां व्यक्ति अंशत: स्वतंत्र तो है, लेकिन दरवाजे पर परतंत्रता की तलवार लटक रही होती है तो अंशत: आजादी की स्थिति भी दासता बन जाती है. भारत-बांग्लादेश सीमा पर सैकडों बिस्तयों में निवास करने वाले हजारों लोग कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में नियति से समझौता कर कठोर जीवन जीने को विवश थे.
पूर्ववर्ती सरकार की नाकाम कोशिशों की पृष्ठभूमि में मौजूदा सरकार ने ऐतिहासिक कदम के रूप में सैकड़ों उपेक्षित बस्तियों को स्वतंत्र करने का बीड़ा उठाया. फलस्वरूप भारत में मौजूद 111 सीमांत बस्तियां बांग्लादेश में चली गयीं और बांग्लादेश स्थित 51 बस्तियां भारत का हिस्सा बनीं.
इस तरह छह दशक बाद इन लोगों ने स्वतंत्रता का स्वाद चखा और इन्हें अपने देश के नागरिक होने का सुखद अहसास हुआ. निश्चय ही ये लोग देशहित में यथासंभव सहयोग करेंगे. ठीक ही कहा गया है- सीमाएं कभी नहीं उलझतीं, उलझते हैं राजनीति के पंडित.
सुधीर कुमार, गोड्डा
