‘40 बनाम 440’

कहते हैं, इतिहास अपने आप को दोहराता है. पर, इतिहास का दोहराव इस बात का सबूत भी है कि पीछे की गलतियों से कोई सबक नहीं लिया गया. गतिरोध का शिकार रहे संसद के मॉनसून सत्र पर यह बात फिट बैठती है. कांग्रेस शुरू से अड़ी है कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह […]

कहते हैं, इतिहास अपने आप को दोहराता है. पर, इतिहास का दोहराव इस बात का सबूत भी है कि पीछे की गलतियों से कोई सबक नहीं लिया गया. गतिरोध का शिकार रहे संसद के मॉनसून सत्र पर यह बात फिट बैठती है.
कांग्रेस शुरू से अड़ी है कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान का जब तक इस्तीफा नहीं हो जाता, वह संसद को एक कदम आगे नहीं चलने देगी. कांग्रेस के इस विरोध से आखिरकार विपक्ष के उसके साथी भी ऊब चुके हैं.
संसद न चलने देने में कांग्रेस के साथ खड़ी दिख रही सपा के सुप्रीमो मुलायम सिंह को आखिरकार कांग्रेसी सांसदों से कहना पड़ा- ‘बहुत ज्यादा हो गया है, अगर आपलोग इसी तरह विरोध करते रहेंगे तो हम आपका साथ नहीं दे पायेंगे.’ मुलायम सिंह ने यह अच्छी बात तनिक देर से कही है, पर उनके ऐसा कहने के साथ इतिहास ने अपने को एक तरह से दोहरा दिया. 2012 में भी संसद का मॉनसून सत्र इसी तरह बाधित हुआ था. विपक्ष की मांग थी कि कोल -ब्लॉक आवंटन घोटाले फंसी यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री इस्तीफा दें.
उस वक्त संसदीय मामलों के मंत्री के रूप में पवन कुमार बंसल ने संसद की एक दिन की कार्यवाही पर होनेवाले खर्चे का हवाला देते हुए विपक्ष से यही कहा था- ‘अब बहुत हो चुका.’ कांग्रेस ने तब विपक्ष को याद दिलाया था कि लोकसभा की कार्यअवधि का 77 और राज्यसभा की कार्यअवधि का 72 प्रतिशत जाया हो चुका है और इस्तीफे पर अड़े विपक्ष को ख्याल नहीं है कि उसके हंगामे से जनता की गाढ़ी कमाई का कितना पैसा बर्बाद हो रहा है. तब कांग्रेस की तरफ से बताया गया था कि संसद एक साल में कम-से-कम 80 दिन चलती है और दोनों सदनों में रोजाना कम-से-कम छह घंटे काम होता है.
अगर संसद पर होनेवाले सालाना खर्चे के हिसाब से देखें तो कार्यवाही में प्रति घंटे सरकारी खजाने से करीब डेढ़ करोड़ रुपये व्यय होता है. 2015 में विपक्ष की बेंच पर बैठी कांग्रेस जब संसद के मॉनसून सत्र में एनडीए के मंत्री ही नहीं, मुख्यमंत्री तक के इस्तीफे की मांग पर सदन की कार्यवाही का रास्ता रोके खड़ी है, तो उसे अपने पुराने दिन और पुराने तर्क याद आने चाहिए. उसे याद आना चाहिए कि मॉनसून सत्र का यह आखिरी हफ्ता है और दोनों सदनों की कार्यअवधि के अधिकांश वक्त को जाया करने का ज्यादातर जिम्मा उसी का है.
उसे याद आना चाहिए कि यदि उसके शासनकाल में विपक्ष ने संसद की कार्यवाही में गतिरोध पैदा कर भारत सरकार का अरबों रुपया बर्बाद किया था, तो स्वयं कांग्रेस भी इस मॉनसून सत्र में यही कर रही है.
कोई कह सकता है कि सदन में होनेवाले कामकाज की तुलना अन्य कामों से नहीं की जा सकती है, या संसदीय कार्यवाही के हानि-लाभ का आकलन उत्पादन और लागत के सामान्य नियम से नहीं हो सकता. चलिए, क्षण भर के लिए यह तर्क मान लें कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की सभा कोई खेत या फैक्ट्री नहीं कि घंटे और खर्च के हिसाब से उसके कामकाज के नफा-नुकसान का आकलन किया जाये, पर संसद तो खेत, फैक्ट्री या बाजार से काफी ऊपर, देशहित के मसलों को तय करनेवाली सभा है.
ऐसे में इस्तीफे की मांग पर अड़ी कांग्रेस का दोष तो और भी संगीन जान पड़ता है. क्या 44 सांसदों वाली कांग्रेस को यह याद दिलाना होगा कि इस मॉनसून सत्र में देशहित से जुड़े 11 बिलों पर फैसला होना है, नौ नये बिल भी पेश होने हैं.
अपने हंगामे के कारण जन-प्रतिनिधियों की सभा को इन बिलों पर राय रखने देने से रोक कर कांग्रेस लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था की गरिमा का एक तरह से हनन कर रही है. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्र महाजन ने कांग्रेस को ठीक ही याद दिलाया है कि ‘40 लोग मिल कर 440 से अधिक सदस्यों का हक नहीं मार सकते और ऐसा आचरण लोकतंत्र की हत्या है.’
अच्छी बात यह है कि कांग्रेस की अतार्किक जिद के सुर में अब अन्य विपक्षी दल अपना स्वर मिलाने से कतराने लगे हैं. मॉनसून सत्र के आखिरी हफ्ते में इस्तीफे की मांग पर अड़ी कांग्रेस कुछ अलग-थलग जान पड़ने लगी है.
यही वजह है कि मुलायम सिंह ने जब गतिरोध पर आगे कांग्रेस का साथ न देने की बात कही, तब विपक्षी दलों के कुछ और सांसदों-जैसे राजद के जयप्रकाश नारायण यादव, आप के भगवंत मान, सपा के धर्मेद्र यादव और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों-ने गतिरोध समाप्त करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष से भेंट की.
उम्मीद की जानी चाहिए कि मॉनसून सत्र का शेष समय रचनात्मक साबित होगा और 15 अगस्त के झंडोत्तोलन से पहले देशवासी संसद से कुछ महत्वपूर्ण बिलों के पारित होने या उन पर सार्थक बहस होने की खुशखबरी सुनेंगे.

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