झारखंड के देवघर जिले के बेलाबागान में दुर्गा मंदिर के पास सोमवार को तड़के सुबह हुई भगदड़ में 10 लोग मारे गये हैं. इस हादसे में 50 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर भी है.
सावन के महीने में झारखंड और आस-पड़ोस के राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ धाम में पवित्र गंगा जल चढ़ाने आते हैं. दुर्घटनास्थल इस पौराणिक मंदिर से महज तीन किलोमीटर की दूरी पर है. इस हादसे ने फिर एक बार धार्मिक आयोजनों की बदइंतजामियों को रेखांकित किया है.
दुर्घटना के कारणों की पूरी तसवीर तो जांच के बाद ही सामने आ सकेगी, लेकिन इतना स्पष्ट है कि भीड़ की संख्या के मुताबिक समुचित व्यवस्था करने में स्थानीय प्रशासन नाकाम रहा है. बैद्यनाथ धाम एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है और हर वर्ष सावन के महीने में आनेवाले तीर्थयात्रियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है. पहले भी यहां ऐसे हादसे हुए हैं और तीर्थयात्रियों को अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
तमाम अनुभवों और त्रसदियों पर अध्ययन के बावजूद सरकार भीड़ को ठीक से प्रबंधन करने में नाकाम रही है. यह त्रसदी गंभीर प्रशासनिक चूक का मामला है और सरकार तथा स्थानीय प्रशासन को इसकी जिम्मेवारी लेनी चाहिए. स्थानीय सांसद निशिकांत दूबे ने भी माना है कि इस हादसे के लिए हमारे प्रबंधन में हुई कमी जिम्मेवार है. भारत में तीर्थस्थलों पर होनेवाली भीड़ में भगदड़ की आशंका आपदा-प्रबंधन में एक बड़ी समस्या मानी जाती है.
वर्ष 2013 में हुए एक अध्ययन में बताया गया था कि भगदड़ की 79 फीसदी घटनाएं धार्मिक आयोजनों और तीर्थ यात्राओं में हुई हैं. पिछले महीने ही आंध्र प्रदेश के गोदावरी पुष्करम मेले में कम-से-कम 29 लोग मारे गये थे.
हाल के वर्षो में मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, ओड़िशा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र आदि राज्यों में ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं. विगत डेढ़ दशक में दो हजार से अधिक लोगों की मौत ऐसी घटनाओं में हो चुकी है. ऐसे हादसों के कारणों में समानता होती है. श्रद्धालुओं के आने-जाने का नियत मार्ग नहीं होता है.
अगर ऐसी व्यवस्था की जाती है, तो उसे लागू करने और लोगों को इस बारे में ठीक से जानकारी देने की कोशिश नहीं की जाती है. भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिस बल और स्वयंसेवियों की तैनाती भी नहीं की जाती है. कोई छोटी-सी अफवाह या अफरा-तफरी मौत के भयावह तांडव में बदल जाती है. भगदड़ की स्थिति में अपर्याप्त और अप्रशिक्षित पुलिस नाकाम हो जाती है और प्रबंधन के अभाव में घायलों को चिकित्सा मुहैया कराने में भी मुश्किल आती है. ऐसे में मरनेवालों की संख्या बढ़ जाती है.
बड़े शहरों से तीर्थस्थलों की दूरी भी राहत और बचाव कार्य के तुरंत पहुंचने में बाधा बन जाती है. अगर हाल के वर्षो में हुई त्रसदियों की सूची पर नजर डालें, तो पता चलता है कि ज्यादातर हादसे उत्तर और पूर्वी भारत के तीर्थस्थलों पर हुए हैं और दक्षिण भारत में बहुत कम दुर्घटनाएं हुई हैं.
आपदा-प्रबंधन के जानकारों के मुताबिक, दक्षिण भारत के मंदिरों या धार्मिक स्थलों पर भीड़ को नियंत्रित करने के लिए तकनीक और अनुभवों के संयोजन से बेहतर व्यवस्था करने की कोशिशें हुई हैं. यह बहुत चिंताजनक है कि कई ऐसी जगहें हैं, जहां अकसर भगदड़ की घटनाएं होती हैं, फिर भी प्रशासनिक स्तर पर इंतजामों को बेहतर करने के प्रयास नहीं किये गये हैं. किसी भी आयोजन से कई महीने पहले से प्रशासन तैयारियों का दंभ भरने लगता है और इनके लिए विशेष बजट भी मुहैया होता है.
भारत का कुख्यात वीआइपी कल्चर भी इन हादसों का एक कारक है. पिछले महीने आंध्र प्रदेश की घटना से पहले राज्य के मुख्यमंत्री और उनके परिवार के विशेष स्नान के लिए आम लोगों को रोका गया था. उनके जाने के तुरंत बाद लोग नदी की ओर दौड़ पड़े थे.
देवघर में भी वीआइपी दर्शन की व्यवस्था है. भले ही इस घटना में यह कारण न रहा हो, पर इसकी समीक्षा की महती जरूरत है. ऐसे हादसों को रोकने के लिए जरूरी है कि किसी भी विपत्ति से बचने के लिए ठोस प्रबंधन और सुरक्षा के नियम बनें और सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जाएं.
प्रशासनिक लापरवाही के साथ तीर्थयात्रियों को भी अनुशासन का पालन करने की प्रवृत्ति का अभाव भी त्रसदी की भयावहता को बढ़ा देता है. अकसर देखा जाता है कि अति-उत्साह और जल्दबाजी के कारण श्रद्धालु अफरा-तफरी का माहौल बना देते हैं तथा नियमों और निर्देशों की अवहेलना करने लगते हैं.
ऐसे में वृद्ध, महिलाएं और बच्चे सर्वाधिक असुरक्षित हो जाते हैं. देवघर की घटना अत्यंत दुखद है. साथ ही, यह त्रसदी सरकार, प्रशासन और समाज के लिए एक गंभीर सबक है और हमें इसकी आवृत्ति को रोकने की पूरी कोशिश करनी चाहिए.
