सरकारी सहयोग पर सफलता निर्भर

देश में प्रत्येक पांच साल में नयी सरकार आती है और अपना-अपना अभियान चलाती है. यूपीए सरकार के कार्यकाल में सर्वशिक्षा अभियान चलाया जा रहा था. अब एनडीए की सरकार आयी है, तो सफाई अभियान चलाया जा रहा है. अभियान चाहे जिस किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चलाया जाये, लेकिन जब तक सरकार […]

देश में प्रत्येक पांच साल में नयी सरकार आती है और अपना-अपना अभियान चलाती है. यूपीए सरकार के कार्यकाल में सर्वशिक्षा अभियान चलाया जा रहा था. अब एनडीए की सरकार आयी है, तो सफाई अभियान चलाया जा रहा है.
अभियान चाहे जिस किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चलाया जाये, लेकिन जब तक सरकार आखिरी पड़ाव तक साथ नहीं निभायेगी, किसी भी अभियान का सफल हो पाना कठिन है.
सरकार के सर्वशिक्षा अभियान में बच्चों को मिड डे मील, साइकिल, वर्दी, किताब आदि वितरित करने की प्रथा शुरू की गयी. इसके पीछे सरकार का लक्ष्य स्कूल आने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करना और गरीब परिवार के बच्चों को शिक्षित करना था. सरकार का उद्देश्य सकारात्मक था, लेकिन इस अभियान की शुरुआत होते ही स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में भी गिरावट आ गयी.
इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार ने अभियान की शुरुआत कर तो दी, लेकिन इसे जारी रखने के लिए अलग से कर्मचारी मुहैया नहीं कराये या फिर अलग से विभाग का गठन नहीं किया गया. स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों को ही इसकी जिम्मेदारी दी गयी. कहने के लिए ग्रामीणों को इसमें समिति के जरिये शामिल किया, लेकिन वे सभी ‘खाने-पकाने’ में ही मशगूल रहते हैं. इसी तरह एनडीए की नयी सरकार ने सफाई अभियान की शुरुआत की है.
सरकार ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में शौचालय के निर्माण की ओर कुछ अधिक ही ध्यान दे रही है. करोड़ों रुपये की लागत से देश के ग्रामीण इलाके में शौचालय बन जायेगा, लेकिन यदि उसके रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जायेगा, तो सरकार द्वारा कराया गया काम बेकार ही साबित होगा. इस पर गौर करना होगा.
उषा महतो, रांची

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