झारखंड को बने 15 वर्ष हो गये, पर अब तक स्थानीयता को परिभाषित नहीं किया जा सका है. यह सवाल अब भी कायम है कि आदिवासी व मूलवासी को छोड़ कर और कौन स्थानीय है?
इस राज्य में बच्चे पैदा हुए, वे यहां के स्थानीय नहीं होंगे, तो कहां के होंगे? जिनका बचपन झारखंड राज्य में बीता, जो यहां की धूल-मिट्टी में खेल कर बड़े हुए, उन्हें यहां की सरकार या लोग स्थानीय क्यों नहीं मानते? पिछले 22 सालों से रांची में रह रहे हैं. जिनका अपना घर है, पर वे स्थानीय नहीं हैं.
आखिर इस मुद्दे पर कब तक नीति बनेगी? कब तक सरकार इस विषय पर मौन साधे रहेगी. इस राज्य के साथ और भी दो राज्य अलग हुए. वहां इस तरह का मुद्दा क्यों नहीं है. यहां के लोगों को स्थानीयता का दंश क्यों ङोलना पड़ रहा है? सरकार स्थानीयता की नीति जल्द परिभाषित करे, तो बेहतर.
मंजू लता सिंह, रांची
