अवधेश कुमार
वरिष्ठ पत्रकार
रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा का बयान है कि यह प्राकृतिक प्रकोप है. हम सब इसके समक्ष बेबस है. निस्संदेह, मनुष्य चाहे प्रगति के जितने सोपान लांघ ले, एक सामान्य प्राकृतिक कहर भी उसकी विवशता एवं दुर्बलता को प्रमाणित कर देता है. हम इस समय सात राज्यों में बाढ़ से हुई तबाही देख रहे हैं.
उसी बारिश ने संभवत: ऐसे दो रेल हादसों को अंजाम दे दिया, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते. न ट्रेनों में टक्कर हुई, न अपनी तीव्र गति के कारण पटरी से उतरे, न सिग्नल में कहीं गड़बड़ी. रेल हादसा का मानवीय कारण यहां गौण है. भारी बारिश ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि पुल उसकी धार को सहन नहीं कर सका और दो-दो रेलों की कई बोगियां नदी की धारा में समा गयीं.
अभी तक की जानकारी से बिल्कुल साफ है कि लगातार बारिश के कारण माचक नदी में पानी का स्तर ऊपर उठता गया और उस पर बना रेलवे पुल धंस गया. यह भी सच है कि भारी बारिश के कारण इस छोटे पुल के ऊपर भी उसकी सहन क्षमता से ज्यादा पानी आ गया, जिससे रेलवे ट्रैक के नीचे की मिट्टी भी बह गयी.
नीचे पानी के बहाव और उठाव, ऊपर पानी के वजन से पुल के धंसने और रेलवे ट्रैक के परिचालन स्थिति में नहीं रहने के कारण ही मुंबई से वाराणसी जा रही कामायनी एक्सप्रेस और मुजफ्फरपुर से मुंबई जा रही जनता एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हो गयीं. कामायनी के 11 और जनता एक्सप्रेस के पांच डिब्बे व इंजन नदी में गिर गये. इन बोगियों में चार सौ से अधिक यात्राी सवार थे. रात का समय, आराम करने की अवस्था.. अचानक अगर पूरा डिब्बा उफान मारती नदी में गिर जाये, तो फिर क्या हो सकता है! वही हुआ.
बहरहाल, इसके आधार पर कोई भी यह स्वीकार करेगा कि अगर इतनी ज्यादा वर्षा नहीं होती, तो ये रेलें सुरक्षित निकल गयी होतीं. खैर, भारत का आपदा राहत बल और सेना के पास अब इतनी क्षमता है कि ऐसे हादसों में वह बेहतर राहत और बचाव कर सके. लेकिन ऐसे हादसों से निपटना जरा कठिन होता है.
कारण, भारी वर्षा कई प्रकार का संकट और चुनौतियां भी लाता है. बोगी सीधे पानी में चली जाये, ऊपर से वर्षा हो रही हो, तो राहत और बचाव की चुनौतियां बढ़ जाती हैं. फंसे लोग असहाय की अवस्था में होते हैं. आसपास के लोगों के लिए भी आम मौसम की तरह सहायता करना कठिन होता है. वर्षा और रास्ते में पानी के कारण बचाव दल का पहुंचना कठिन होता है.
एक ओर वर्षा दूसरी ओर अंधेरा.. इसमें न तो डूबते लोगों को बचने का रास्ता नजर आता है, न राहत दल को ही तेजी से उनके पास पहुंचने के उपाय. और इन सबसे हताहतों की संख्या बढ़ती है.
इसी वर्ष 23 मई को असम के कोकराझार में चंपावती नदी में सिफुंग पैसेंजर के कई डिब्बे गिर गये थे.हालांकि उसमें कोई मरा नहीं, पर करीब 40 लोग घायल हो गये. 29 जून, 2005 को सिकंदराबाद पैसेंजर के डिब्बे आंध्र प्रदेश के नलगोंडा में मूसी नदी में गिर पड़े थे, जिससे 100 लोगों की मौत हो गयी थी. 22 जून, 2001 को मंगलोर-चेन्नई मेल के चार डिब्बे कडालुंडी नदी में लुढ़क गये थे, जिससे 57 लोग मौत के मुंह में समा गये थे.
14 सितंबर, 1997 को बिलासपुर के पास अहमदाबाद-हावड़ा एक्सप्रेस के डिब्बे नदी में गिरे थे और उसमें 81 लोगों की मौत हो गयी थी. किंतु पूर्व की इन दुर्घटनाओं और वर्तमान हादसे में अंतर है. बारिश के जल प्लावन से पुल का धंसना और ट्रैक क्षतिग्रस्त हो जाने से दो रेलों का एक साथ उनका ग्रास बन जाना असामान्य घटना है.
10-15 मिनट पहले ही वहां से एक रेल गुजरी थी. पता नहीं उस समय तक ट्रैक और पुल की क्या स्थिति थी, लेकिन वह सुरक्षित निकल गयी थी.
अगर उस समय रेलवे चालक या गार्ड को कुछ असामान्य दिखता, तो वे अवश्य हरदा या इटारसी स्टेशन को सूचित किये होते. यह भी सूचना है कि खिरकिया के भिरंगी और मसनगांव के बीच 668/10 पुल पर ट्रैक के नीचे की मिट्टी बह जाने की सूचना इटारसी स्टेशन पर मिलने के बाद रात 12 बजे यान से रेलवे कर्मी रवाना हुए थे.
इन हादसों में यह सबक तो है कि इससे अनुभव लेकर ऐसे सभी पुलों की क्षमता का पुनमरूल्यांकन किया जाये. जहां भी मरम्मत या क्षमतावृद्धि की जरूरत हो, तत्काल आरंभ हो. ऐसी जगहों पर विशेष निगरानी की व्यवस्था विकसित हो.
भले ही प्रकृति के सामने हमारे सारे प्रबंध ध्वस्त हो जाते हैं, लेकिन जो हमारे वश में है, हमें वह सब करना चाहिए. इस समय जिन सात राज्यों में बाढ़ की विकरालता हम देख रहे हैं, वहां आपदा राहत बल, सेना, पुलिस, सरकारी महकमे भी अनेक स्थानों पर लाचार दिख रहे हैं.
200 से ज्यादा लोगों का जीवन बाढ़ ले चुकी है. हजारों को बेघर, कंगाल बना चुकी है. लाखों हेक्टेयर फसलें बरबाद हो चुकी हैं. हालांकि, हम कुछ भी करें, पर प्रकृति की प्रकोप से स्थायी और पूरी तरह सुरक्षित रहना न संभव था, न है और न होगा.
