नगालैंड में शांति बहाल करने की लंबे अरसे से चली आ रही कोशिशें सोमवार को एक अहम पड़ाव पर पहुंची.भारत सरकार और नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन-आइएम) के बीच नगालैंड समस्या के राजनीतिक समाधान पर सहमति निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक अवसर है.
नागा आंदोलन देश का सबसे पुराना अलगाववादी आंदोलन है और पूरा पूवरेत्तर दशकों से इस संघर्ष की हिंसा में झुलस रहा है.
हालांकि समझौते का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन दोनों पक्षों ने कहा है कि लंबी बातचीत ने परस्पर भरोसे, सम्मान और बराबरी की भावना को मजबूत किया है. आजादी के बाद से ही भारत सरकार नगा विद्रोहियों के साथ शांति स्थापित करने की कोशिश करती रही है.
इस कड़ी में 1975 का शिलांग समझौता एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, पर 1980 में मुइवा, आइजाक और खापलांग ने समझौते को नकारते हुए एनएससीएन की स्थापना की. मौजूदा समझौता संगठन के मुइवा और आइजाक गुट के साथ हुआ है.
खापलांग गुट इस वर्ष मार्च में युद्धविराम तोड़ने के बाद हिंसात्मक गतिविधियों में लगा हुआ है. नगालैंड सरकार राज्य के विभिन्न संगठनों के माध्यम से उन्हें बातचीत के लिए तैयार करने में लगी है और आशा है कि इस समझौते के बाद खापलांग समेत अन्य भूमिगत समूहों पर भी मुख्यधारा में आने का दबाव बढ़ेगा.
आइजाक और मुइवा के साथ 1995 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने पेरिस में और 1997 में प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने ज्यूरिख में बातचीत की थी. उसी वर्ष इस गुट के साथ युद्धविराम हुआ था.
1998 व 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और 2004 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी नगा नेताओं से मिले थे. दोनों पक्षों के बीच अब तक विभिन्न स्तरों पर 80 से अधिक वार्ताएं हो चुकी हैं, पर मोदी सरकार के आने के बाद इसमें तेजी आयी.
नगालैंड की राजनीति ने भी इसमें सकारात्मक भूमिका अदा की. राज्य में सर्वदलीय सरकार है, जिसने नगा समाज के हर संगठन को विश्वास में लेने की कोशिश की है.
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा पूवरेत्तर के लिए विशेष मंत्रलय बनाने और इलाके के विकास के लिए की जा रही कोशिशों ने भी माहौल को बेहतर बनाया है.
पूवरेत्तर में शांति इस इलाके के विकास के साथ-साथ म्यांमार, चीन और बांग्लादेश के साथ हमारे अच्छे राजनीतिक और व्यापारिक संबंधों की जरूरी शर्त है. हालांकि यह समझौता स्थिरता की गारंटी नहीं है, परंतु इससे पूर्वोत्तर भारत में बेहतरी की उम्मीदें बढ़ गयी हैं.
