आज की झूठी समाजसेवा का असली मकसद उच्च राजनीतिक पद हासिल करना होता है. समाज सेवा व गरीबों का नेता बन कर घूमना सिर्फ दिखावा है.आज स्थिति यह है कि जनसेवा करते-करते नेताजी मालामाल हो जाते हैं और जनता फटेहाल ही रह जाती है.
चुनावी माहौल में फिल्मी हस्तियों का तड़का बनानेवाले नेतागण चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र की जनता के लिए ‘ताड़का’ सदृश बन जाते हैं. खुद गायब हो जाते है.
ऐसे प्रतिनिधियों को समझ लेना चाहिए कि काठ की हाड़ी चूल्हे पर बार-बार नहीं चढ़ती. अगर उन्हें खुद का विकास करना है, तो उन्हें क्षेत्र में नजर आना होगा, उसका विकास करना होगा.
वहीं, जनता को भी चाहिए कि वह काठ की हांडी को कभी भी अपना प्रतिनिधि बनने का मौका न दें. अगर उन्हें अपना प्रतिनिधि ही चुनना है, तो किसी लौह पुरुष का चयन करें.
संदीप कुमार चौधरी, करौं, देवघर
