राजनेताओं द्वारा की जा रही ओछी बयानबाजी एवं अभद्र टिप्पणियां भारतीय राजनीति के एक अत्यंत निराशाजनक पहलू को उजागर करती हैं. सैद्धांतिक दृष्टिकोण से लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में पार्टियां और नेता संवैधानिक मूल्यों और आदर्शो के पहरुआ भी होते हैं और उसके आदर्श प्रतिनिधि भी. दुर्भाग्य से, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के बावजूद हमारे देश में वास्तविक स्थिति इसके उलट है.
पिछले दिनों कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुरुदास कामत ने राजस्थान में एक बैठक के दौरान केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की योग्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि वे एक होटल में सफाई का काम करती थीं. कामत के इस बयान से कामकाजी लोगों, खासकर महिलाओं, के बारे में उनकी अपमानजनक भावनाओं का पता चलता है. कामत को नहीं भूलना चाहिए कि जिस जनता की वजह से नेताओं को सत्ता सुख भोगने का मौका मिलता है, उसका बड़ा हिस्सा गरीब एवं श्रमजीवी है.
देश में करोड़ों लोग, जिनमें करीब आधी संख्या महिलाओं की है, दिन-रात कड़ी मेहनत कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. इस मेहनतकश आबादी का देश की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान है. भारत का संविधान हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपनी क्षमता और मेहनत से सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह बनाये.
यही कारण है कि आज संसद से लेकर राज्यों की विधानसभाओं तक में बड़ी संख्या में ऐसे नेता भी हैं जो कमजोर सामाजिक और आर्थिक परिवेश से आते हैं. कामत को अधिकार है कि वे स्मृति ईरानी या किसी अन्य मंत्री की कार्यक्षमता पर सवाल उठायें, परंतु इसका आधार मौजूदा कामकाज एवं सार्वजनिक आचार-व्यवहार ही हो सकता है, न कि व्यक्ति-विशेष की पारिवारिक, सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि. आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं.
वे घर की चौखट से निकल कर अपनी आकांक्षाओं की मंजिलों की ओर अग्रसर हैं. ऐसे वक्त में, कामत की टिप्पणी न सिर्फ कामकाजी महिलाओं का अपमान है, बल्कि इससे उनकी सामंती मानसिकता का भी पता चलता है. यह स्थिति तब है, जब उनकी पार्टी की मुखिया भी एक महिला हैं.
राष्ट्रीय महिला आयोग ने उचित ही उनसे जवाब-तलब किया है. गांधीजी ने कहा था कि महिलाओं के विकास एवं सम्मान के बिना देश के विकास की कल्पना अर्थहीन है. उम्मीद है कि कामत को अपनी गलती का अहसास होगा और वे इसके लिए सार्वजनिक माफी मांगेंगे.
