हर मसले को धार्मिक चश्मे से न देखें

एक ही वक्त में किसी को राष्ट्रीय सम्मान तो किसी का अपमान? आखिर एक ही देश में लोगों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जाता है? 12 मार्च, 1993 को दिल दहला देने वाली घटना पर पूरा देश रोया था. दिन गुरुवार, तिथि 30 जुलाई को इस दुखद घटना के एक आरोपी को सजा देकर […]

एक ही वक्त में किसी को राष्ट्रीय सम्मान तो किसी का अपमान? आखिर एक ही देश में लोगों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जाता है? 12 मार्च, 1993 को दिल दहला देने वाली घटना पर पूरा देश रोया था.
दिन गुरुवार, तिथि 30 जुलाई को इस दुखद घटना के एक आरोपी को सजा देकर न्यायपालिका का मजाक उड़ाने से बचाया गया है. मगर 22 वर्ष का इंतजार भी कोई छोटी बात नहीं है.
सजा में देरी के कारण सजा के विरोधियों को आवाज बुलंद करने का मौका मिल गया. विरोधियों के बुलंद आवाज का ही नतीजा है कि सजा पर फैसला लेने के लिए न्यायपालिका के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया गया. रात को अदालत खुली. पूरे देश में रातभर हाय-तौबा मची रही.
सजा के पक्षधर और विपक्षी दोनों परेशान थे. कुछ लोगों को मुफ्त में पब्लिसिटी मिली, तो कोई बेचैन होने का नाटक करता रहा. देश के वरिष्ठ सये लेकर ‘गरिष्ठ’ तक सभी सजा के विरोध में खड़े हो गये. लोगों को उनके परिवार की चिंता सताने लगी.
मगर सजा के विरोधियों को उन परिवारों की चिंता कभी नहीं सतायी, जिनके परिजन 1993 के बम धमाकों में मारे गये. हद तो तब हो गयी, जब कई लोगों ने 1993 के धमाकों को निदरेष तक कह डाला. यदि 1993 का आरोपी निदरेष हो सकता है, तो नि:संदेह देश के दूसरे हिस्से में आतंक और उग्रवाद फैलानेवाले भी निदरेष हो सकते हैं. देश की राजनीतिक विद्रुपता की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है कि हर मसले को धर्म से जोड़ दिया जाता है.
कुत्सित राजनीति करनेवाले ये क्यों नहीं सोचते कि उनकी हरकतों से देश में नये सिरे से उत्पात मच सकता है. लोगों की भावनाएं भड़क सकती हैं. आखिर हर मसले को धर्म के चश्मे से देखना कहां तक न्यायोचित है?
हरिश्चंद्र महतो, बेलपोश, प सिंहभूम

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