समझ से परे है भारतीय रेलवे का चरित्र

स्वतंत्रता प्राप्ति के 67 वर्षो बाद अत्यंत ताम-झाम से हजारीबाग में आयी रेल का सबकुछ लोहा ही लोहा है, जिसकी कृत्रिम प्रक्रियाओं द्वारा अजिर्त ऊपर-ऊपर चमकती सोने की कलई मात्र चार माह में ही उतर गयी है. शायद यह राजनीति की धूल तथा अकर्मण्यता का ही प्रभाव है कि मुख्यालय हजारीबाग सहित कोडरमा तक के […]

स्वतंत्रता प्राप्ति के 67 वर्षो बाद अत्यंत ताम-झाम से हजारीबाग में आयी रेल का सबकुछ लोहा ही लोहा है, जिसकी कृत्रिम प्रक्रियाओं द्वारा अजिर्त ऊपर-ऊपर चमकती सोने की कलई मात्र चार माह में ही उतर गयी है.
शायद यह राजनीति की धूल तथा अकर्मण्यता का ही प्रभाव है कि मुख्यालय हजारीबाग सहित कोडरमा तक के अन्य सभी स्टेशनों की साफ-सफाई, यात्री-सुविधाएं, उपकरण-अनुरक्षण, सिग्नल तथा संचार व्यवस्था अतयंत दयनीय स्थिति में है. ट्रेन लगभग 80 किलोमीटर की दूरी ढाई से तीन घंटों में तय करती है.
कभी-कभी चार-पांच घंटे भी लगते हैं. हमेशा यह भय बना रहता है कि रेल कहीं भी सुनसान जगह पर अनावश्यक रूप से खड़ी न हो जाये. इसके अतिरिक्त किसी भी स्टेशन पर ट्रेन हमेशा कदमताल की गति में ही आती है. रेलवे का यह चरित्र समझ से परे है.
अविनाश चंद्र श्रीवास्तव, हजारीबाग

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