आदमी का जीवन बचानेवाली दवाओं की मर्ज दुरुस्त करने की शक्ति समाप्त होने के बाद उसकी एक्सपायरी डेट निर्धारित कर दी जाती है. नियत समय के बाद दवा एक्सपायर कर जाती है.
इसी प्रकार संसार के प्रत्येक सजीव वस्तुओं के जिंदा रहने की एक उम्र निर्धारित होती है, लेकिन इसी संसार में आदमी के द्वारा बनाया गया भ्रष्टाचार कभी एक्सपायर नहीं करता. हर युग और समय में वह अपने रूपों को बदलते रहता है, फिर भी जिंदा रहता है.
गुलाम भारत में गांधी, नेहरू, डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ राधाकृष्णन आदि के समय में भ्रष्टाचार कम था, लेकिन उसका रूप दूसरा था. तब के समय में भारतीय भ्रष्ट नहीं थे, यहां के अंगरेज शासक भ्रष्ट थे. तब उसका रूप दूसरा था. आज उसका रूप बदल गया है और अंगरेजों के स्थान पर भारतीय ही भ्रष्ट हो गये हैं.
गुलाम भारत में भारतीय नेता अंगरेजों के भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ आंदोलन करते थे, आज के आजाद भारत में भ्रष्ट भारतीय के लिए भारतीय को ही आंदोलन करना पड़ रहा है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा ली हैं. यह देख-सुन कर आश्चर्य होता है कि देश की जनता का प्रतिनिधित्व करनेवाला नेता ही भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है. सरकार विभागों में कार्यरत कर्मचारी और पदाधिकारी तो भ्रष्टाचार के पर्याय ही बन गये हैं.
आज जरूरत इस बात की नहीं है कि लोग अधिकाधिक संख्या में नेता, अधिकारी और कर्मचारी बनें, आवश्यकता इस बात की है कि लोग इन शब्दों की मर्यादा को बनाए रखें. नेता, अधिकारी और कर्मचारी तो कोई भी बन सकता है, लेकिन उसकी गरिमा का पालन करना आसान नहीं है. उसके लिए त्याग करना ही पड़ता है.
परमेश्वर झा, दुमका
