रत्नगर्भा हमारी धरती के उदर में संचित अनेक उपेक्षित व अभिशप्त, किंतु बहुमूल्य एवं दुर्लभ रत्न, पर्याप्त अवसर, प्रोत्साहन, सम्मान और समर्थन के अभाव में मर्माहत हो सतह पर आकर अपना प्रकाश व चमक-दमक बिखेर नहीं पाते. प्रगति-प्रेरणा के स्नेत इन रत्नों की प्रतिभा, योग्यता, दक्षता एवं क्षमता से वंचित हो जाने के कारण राष्ट्र का विकास बाधित होता है.
लोकतंत्र में यह अपेक्षा की जाती है कि देश में उपलब्ध या छिपे सभी रत्नों व संसाधनों का उपयोग निष्ठापूर्वक देशहित में बिना किसी भेदभाव के किया जाये. दुर्भाग्य से लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत संचालित शासन व प्रशासन ऐसा करते प्रतीत नहीं होते.
वहीं, सौभाग्य से न्यायपालिका अपने लोकतांत्रिक तथा संवैधानिक कर्तव्यों एवं दायित्वों का निर्वहन करने के प्रति पूर्णत: सचेत है. इस क्रम में यह लोकतंत्र तथा उपलब्ध रत्नों की आभा के संरक्षण व परिष्करण के लिए प्रयासरत एवं समर्पित है. वर्तमान परिस्थिति में विचारों के आदान-प्रदान का सशक्त साधन मीडिया, मीठा सा झरना बन मरुस्थल में रूपांतरित होते भारतीय लोकतंत्र को हरा-भरा बना सकता है.
यह ऐसी पृष्ठभूमि की संरचना करने में सक्षम है, जिसके आलोक में प्रच्छन्न व सुप्त रत्नों जैसे विद्वानों, चिंतकों एवं प्रखर देशभक्तों के विचारों, कृतियों, वार्ताओं तथा परामर्शो को न केवल व्यापक आयाम मिल सकता है, बल्कि देश की प्रगति, गौरव, संप्रभुता, सुरक्षा, कल्याण आदि के निमित्त जनता तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था के सभी अंगों की सोच, सिद्धांत, कार्यशैली एवं वातावरण में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है.
आशा है, मीडिया अधिक सक्रिय एवं सजग बन सृजनशील संघर्ष संवेग तथा आवृत्ति बढ़ायेगा.
अविनाश चंद्र श्रीवास्तव, हजारीबाग
