शहर हो या गांव, हर जगह सामान्य वर्ग के लोगों को उनकी जमीन की बाजार भाव पर सही कीमत मिल जाती है, लेकिन सीएनटी की बाध्यता के कारण आदिवासी जमीन के मालिकों को बाजार भाव से 10 से 20 गुना कम दर मिल पाती है.
इससे वे न तो अपना अच्छा घर बनवा सकते हैं और न ही महंगा इलाज करा सकते हैं. बच्चों की अच्छी शिक्षा और रहन-सहन में बदलाव करना तो दूर की कौड़ी है. जमीन के दाम के रूप में मिली रकम परिवार के भरण-पोषण में ही समाप्त हो जाती है.
आखिर में उन्हें अपनी जमीन से बेदखल होकर रेजा-कुली, घरेलू नौकर-नौकरानी या फिर कोई छोटा काम करना पड़ता है. स्वार्थ के वशीभूत होने के कारण इनकी चिंता न तो राजनेताओं को है और न ही आदिवासी समाज के लोगों को. ऐसे में सीएनटी में संशोधन ही उनका उद्धार कर सकता है.
ज्योति टोप्पो, रांची
