ऐसा तभी संभव है, जब भारत निवेशकों के लिए आकर्षक स्थितियां तैयार कर सके. अर्थशास्त्री एवं नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानागढ़िया संकेत कर चुके हैं कि केंद्र में एक सक्षम सरकार के रहते ऐसी आकर्षक स्थितियां मौजूद हैं. उन्होंने भारत में मौजूद कुशल व युवा कामगारों की भारी संख्या तथा बचत-दर ऊंचा उठाने की संभावनाओं की तरफ ध्यान दिलाया है और इसी आधार पर अनुमान लगाया है कि भारत अगले 15 वर्षो में विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन कर उभरेगा.
भारत में श्रम-बाजार का अपेक्षाकृत सस्ता होना भी वैश्विक पूंजी के निवेश के लिए भारत को एक आकर्षक जगह बनाता है. चुनौती इस बढ़त को कायम रखने की है. इसलिए ट्रेड यूनियनों को अपने कामकाज से ऐसे संकेत नहीं देने चाहिए, जिससे विश्व के निवेशकों को लगे कि भारत में कार्य-संस्कृति उनकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं है. आये दिन की हड़ताल, चक्का-जाम या किसी विचारधारा विशेष से प्रभावित होकर कार्य-प्रबंधन को लगातार अपनी मांगों के आगे विवश करने की ट्रेड यूनियनों की पुरानी रणनीति भारत के नयी आर्थिक जरूरतों से मेल नहीं खाती. भारत की नयी आर्थिक जरूरतें उदारीकृत अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में बनी हैं. आज हर देश की आर्थिक नियति एक-दूसरे से बहुत मजबूती से बंधी हुई है. किसी एक देश की अर्थव्यवस्था के डांवाडोल होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है.
यूनान का आर्थिक संकट इसका उदाहरण है. विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को मिल-बैठ कर ऐसे संकट का समाधान खोजना पड़ता है. आर्थिक मंदी से जूझती कुछ बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मद्देनजर विश्व मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं अपने आकलन में भारत को दुनिया के आर्थिक भविष्य की बेहतरी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मान कर चल रही हैं. ऐसे में वित्तमंत्री की चिंता जायज है कि ट्रेड यूनियनों को जिम्मेवारी भरा फैसला लेना चाहिए, ताकि देश में निवेश का प्रवाह अवरुद्ध न हो, रोजगार के अवसर बढ़े और मौजूदा नौकरियों पर आंच न आये.
