मानव की विभिन्न जैविक आवश्यकताओं में यौन संतुष्टि एक आधारभूत आवश्यकता है. चिकित्सा विज्ञान ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है कि यौन इच्छाओं की पूर्ति स्वस्थ जीवन की अनिवार्यता है. सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए इस संबंध में कुछ सामाजिक और धार्मिक नियम भी बनाये गये हैं, लेकिन परेशानी इस बात की है कि आज लोग अपने सामाजिक कर्तव्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों को छोड़ अनुचित व अनैतिक रूप से यौन संतुष्टि को बढ़ावा दे रहे हैं जो सरासर गलत है.
इस प्रकार के प्रोत्साहन से समाज के टूटने और लोगों के नैतिक पतन होने का खतरा बढ़ रहा है. बीते कुछ वर्षो में बलात्कार व दुष्कर्म की घटनाओं ने देशवासियों को उद्वेलित कर दिया है. कुत्सित मानिसकता के शिकार कुकर्मियों को न उम्र का ख्याल है और न ही समाज की मर्यादा का. अपनी हवस की पूर्ति के लिए पल भर में ही सामाजिक मूल्यों, प्रतिमान व संस्कार की तिलांजलि देते हैं. यही वजह है कि आज समाज की बहू-बेटियां हर तरफ और हर समय खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं. कभी पराये, तो कभी अपने ही हैवानियत पर उतर आते हैं.
हमारा समाज विवाह से पूर्व तथा अपनी जीवनसाथी से इतर ऐसे संबंधों की इजाजत नहीं देता. बावजूद इसके दुष्कर्म की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है. समाज के इस घिनौने व विषैले वातावरण में समाज की बहू-बेटियों के आबरू की सुरक्षा एक बड़ी जिम्मेदारी है. कभी झांसा देकर, बहला कर तो कभी जबरदस्ती महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता रहा है. क्यों आज हम स्त्रियों को केवल भोग की वस्तु समझते हैं? वे हमारे समाज के अभिन्न अंग हैं. उन्हें सुरक्षित करने की जरूरत है.
सुधीर कुमार, गोड्डा
