देरी की जवाबदेही

जुलाई के शुरू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष बैठक कर जयपुर-दिल्ली राजमार्ग को इस वर्ष अक्तूबर तक पूरा करने का निर्देश जारी किया है. इस राजमार्ग को तीन वर्ष पहले ही तैयार होना था. ऐसी कई परियोजनाओं की यही दशा है. पिछली सरकार द्वारा 77 परियोजनाओं की अनुमति दी गयी थी, जिनमें से 30 […]

जुलाई के शुरू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष बैठक कर जयपुर-दिल्ली राजमार्ग को इस वर्ष अक्तूबर तक पूरा करने का निर्देश जारी किया है. इस राजमार्ग को तीन वर्ष पहले ही तैयार होना था. ऐसी कई परियोजनाओं की यही दशा है. पिछली सरकार द्वारा 77 परियोजनाओं की अनुमति दी गयी थी, जिनमें से 30 पर काम भी शुरू नहीं हो सका है. बजट में 1.15 लाख करोड़ के आवंटन के साथ 42 लंबित परियोजनाओं को शुरू करने की घोषणा हुई थी.

इनमें आधी राजमार्गो से संबंधित हैं. इस वर्ष बजट में 12.6 अरब डॉलर का प्रावधान सड़कों के लिए और 16 अरब डॉलर का रेलमार्गो के लिए किया गया है. परियोजनाओं के शीघ्र कार्यान्वयन के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय ने संबद्ध विभागों, ठेकेदार कंपनियों और बैंकों पर भी दबाव बनाया है. बैंकों के 49 बिलियन डॉलर खराब कर्ज के रूप में फंसे हुए हैं जिनमें से अधिकांश इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में लगे हुए हैं. इस कारण बैंक ऐसी परियोजनाओं के लिए अधिक धन मुहैया करने में आनाकानी करते हैं. अनावश्यक विलंब के कारण परियोजनाओं का खर्च बढ़ता है तथा विकास और रोजगार के जुड़े लक्ष्यों को पूरा करने में भी देरी होती है. इस देरी के कारण बैंकों के फंसे धन का उपयोग अन्य परियोजनाओं में भी नहीं हो पाता.

साथ ही, सरकारी निवेश भी गैरजरूरी मदों में खर्च हो जाता है. सरकार इस वर्ष के लिए निर्धारित 6.8 अरब डॉलर में से अप्रैल से अब तक दो अरब डॉलर खर्च कर चुकी है, परंतु इसका अधिकांश हिस्सा धन की कमी से जूझ रहीं निर्माण कंपनियों के खाते में गया है. निश्चित रूप से भूमि अधिग्रहण में समस्या, संस्थाओं के बीच तालमेल और निगरानी की कमी से परियोजनाएं आधार में लटकी पड़ी हैं, लेकिन अगर प्रधानमंत्री कार्यालय को परियोजनाओं पर नजर रखना पड़े, तो इसका अर्थ यह है कि पूरे तंत्र में भारी गड़बड़ियां हैं.

सरकार ने 10 हजार किलोमीटर राजमार्ग प्रतिवर्ष बनाने का लक्ष्य रखा है, पर मौजूदा दर मात्र 4,200 किलोमीटर की ही है. इस वित्त वर्ष में अब तक 500 किलोमीटर से भी कम सडकें नयी योजनाओं में बन सकी हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय से ही निगरानी की ऐसी व्यवस्था बनी थी, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने भी बरकरार रखा है. इस वर्ष मार्च में ‘प्रगति’ नामक इकाई भी प्रधानमंत्री कार्यालय में स्थापित की गयी है. परंतु परियोजनाओं की परिकल्पना से कार्यान्वयन तक सभी संबद्ध पक्षों को पूरी जवाबदेही के साथ काम करने के अलावा कोई चारा नहीं है.

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