एक समय था, जब सत्ता अस्त्र-शस्त्रों वाले युद्ध से प्राप्त की जाती थी, आज इसे वाक् युद्ध से प्राप्त किया जाता है.
इस युद्ध का सबसे बड़ा हथियार ‘विकास’ है. यदि ‘विकास’ का तात्पर्य इसकी स्वाभाविकता से है, तो वह स्वागतयोग्य है, क्योंकि विकास स्वाभाविक भी हो सकता है और कृत्रिम भी. पेड़ों में फलों का पकना उसका स्वाभाविक विकास है, लेकिन पेड़ों के फलों को कच्चेपन में ही तोड़ कर रासायनिक पदार्थो के जरिये पकाना ‘विकास’ की व्यावसायिकता है.
इस विकास की व्यावसायिकता का गंभीर परिणाम भी भुगतने को मिल सकता है, क्योंकि फलों को पकाने में उपयोग किया जानेवाला रासायनिक पदार्थ मानव शरीर पर परोक्ष तरीके से गंभीर असर करता है. उसी प्रकार समाज का अस्वाभाविक या कृत्रिम विकास देश और समाज को नुकसान पहुंचाता है.
अपर्णा लाल, हजारीबाग
