आज हम खुद को प्रगतिशील समाज के ब्रांड अंबेसडर कहते नहीं थकते, मगर सच्चई इसके विपरीत प्रतीत होती है. 22 जून को प्रभात खबर में प्रकाशित समाचार ‘स्कूल निदेशक को मार डाला’ हमारे प्रगतिशील समाज के ढोंग पर जोरदार प्रहार था. आज देश के कोने-कोने से ऐसी खबरें आ रही हैं.
यह हमें समझ में नहीं आता कि हम कहां आ गये हैं? हमारी शालीनता और संवेदनशीलता कहां खो गयी है? आखिर हम लोकतांत्रिक मूल्यों की अवमानना करके क्या सिद्ध करना चाहते हैं? आज हम कानून को अपने हाथ में लेकर किसी को भी सजा दे देते हैं.
क्षण भर की माथापच्ची के बाद किसी को भी दोषी करार दे देते हैं. क्या यही सामाजिकता व नैतिकता का तकाजा है? क्या हमारा कानून लोगों को न्याय देने में असमर्थ हैं, जो लोग कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं? समाज के ठेकेदार खुद में सुधार करें.
निहाल कुमार, रांची
