पाकिस्तान नहीं बदला, भाजपा बदली है

आकार पटेल वरिष्ठ पत्रकार सच यह है कि मोदी अभी जो मध्य एशिया की यात्रा पर हैं, उन्हें यह मालूम हो गया होगा कि वह इन देशों के साथ गैस समेत जिन प्राकृतिक संसाधनों के कारोबार में रुचि रखते हैं, वह केवल पाकिस्तान के रास्ते ही संभव हो पायेगा. पाकिस्तान जाने की घोषणा करके प्रधानमंत्री […]

आकार पटेल
वरिष्ठ पत्रकार
सच यह है कि मोदी अभी जो मध्य एशिया की यात्रा पर हैं, उन्हें यह मालूम हो गया होगा कि वह इन देशों के साथ गैस समेत जिन प्राकृतिक संसाधनों के कारोबार में रुचि रखते हैं, वह केवल पाकिस्तान के रास्ते ही संभव हो पायेगा.
पाकिस्तान जाने की घोषणा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो बहादुराना कदम उठाया है, इसके लिए उन्हें बधाई दी जानी चाहिए. यहां बहादुर से मेरा आशय सिर्फ शारीरिक साहस से नहीं है. मैं कई बार पाकिस्तान जा चुका हूं और मैंने कभी असुरक्षित महसूस नहीं किया, और यह साफ है कि मोदी जब वहां जायेंगे, तो पायेंगे कि उनकी सुरक्षा सर्वोच्च मानदंड की है.
लेकिन फिर भी बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब पाकिस्तान के सबसे ज्यादा सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति, राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के काफिले पर दो बार बम हमले हुए और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को कत्ल कर दिया गया. इसलिए पाकिस्तान जाने की रजामंदी देकर मोदी ने बहादुरी दिखायी है, जबकि क्रिकेट टीमें तक वहां जाने से इनकार कर चुकी हैं.
जिस दूसरे मामले में वह बहादुर रहे हैं, वह यह कि उन्होंने हमारे मीडिया और रणनीतिक मामलों के हमारे विशेषज्ञों में से बहुतों को दरकिनार करते हुए निर्णायक ढंग से पाकिस्तान की ओर हाथ बढ़ाया है. इससे ज्यादा अहम यह है कि वह उन भाजपा समर्थकों की अनदेखी कर रहे हैं, जिनका जोर इस बात पर होता है कि या तो पाकिस्तान से सख्ती से निबटा जाये या उससे कोई बात न हो.
नवाज शरीफ की खिल्ली उड़ाने के लिए मोदी को लंबे समय से शाबाशी मिलती रही है. पिछले एक साल से भारत यह कहता रहा है कि वह पाकिस्तान को अपनी शर्तो पर झुका कर मानेगा. यही वजह थी कि भारत ने हुर्रियत के साथ पाकिस्तानी उच्चयुक्त की मुलाकात जैसे तुच्छ विषय पर पाकिस्तान से मुंह फुला लिया.
अन्य मसलों, जैसे नियंत्रण रेखा पर लगभग लगातार गोलीबारी पर यह साफ हो गया है कि भाजपा अपने उस रुख पर नहीं टिक सकी कि भारत के पास इतनी हमलावर क्षमता है कि पाकिस्तान को निर्णायक ढंग से अपने काबू में कर लिया जायेगा.
हमने ऐसा नहीं किया. इस हकीकत के मद्देनजर, यह तय था कि भारत को पाकिस्तान के प्रति अपना नजरिया बदलना पड़ेगा. मोदी ने अब यह काम कर लिया है, जैसा कि मैंने कहा निर्णायक ढंग से. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एक व्यक्ति का पाकिस्तान दौरा करना, जो उस देश को चिरशत्रु मानता हो, एक असाधारण भाव-भंगिमा है.
मेरे पुराने बॉस एमजे अकबर, जो इन दिनों भाजपा में बाहैसियत राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं, ने मोदी के इस यू-टर्न को एक खूबसूरत जामा पहनाया है. उन्होंने कहा है कि ‘यह पहली बार है जब पाकिस्तान ने ‘सभी रूपों में मौजूद आतंकवाद’ से लड़ना कबूल किया है.’ यकीनन यह झूठ है. पाकिस्तान ठीक इसी सूत्रीकरण-सभी रूपों में आतंकवाद को खारिज करने- की बात 9/11 के समय से ही कर रहा है.
वास्तव में ‘आतंक के सभी रूपों’ वाक्यांश का इस्तेमाल पाकिस्तान द्वारा खास तौर पर उसे शामिल करने के लिए किया जाता है, जिसे वह कश्मीर में भारतीय राज्य का आतंकवाद कहता है! इसलिए भाजपा द्वारा इसे जीत कहना कुछ ज्यादा ही है.
सच यह है कि मोदी अभी जो मध्य एशिया की यात्रा पर हैं, उन्हें यह मालूम हो गया होगा कि वह इन देशों के साथ गैस समेत जिन प्राकृतिक संसाधनों के कारोबार में रुचि रखते हैं, वह केवल पाकिस्तान के रास्ते ही संभव हो पायेगा. भारत यह उम्मीद नहीं कर सकता है कि मध्य एशिया अपनी जगह से कूद कर अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करके उसके पास आ जायेगा. यदि हम तुर्कमेनिस्तान, ताजिकस्तान, उज्बेकिस्तान और कजाकस्तान से अच्छे और सशक्त संबंध चाहते हैं, तो हम ऐसा पाकिस्तान से अच्छे और सशक्त संबंध बनाने के बाद ही कर सकते हैं.
भाजपा के एक अन्य नेता, अटल बिहारी वाजेपयी अकसर अपनी बुद्धिमत्ता में यह कहा करते थे कि ‘भूगोल से भागा नहीं जा सकता है’. मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं.
जो भी हो, मेरा काम अपनी बात कहते रहना है. मैंने यही बात पिछले साल नवंबर में भी लिखी थी, जब एक बार और मोदी ने पाकिस्तान पर अपना रुख बदल लिया था :
‘मेरे विचार से मोदी ने अपने कदमों के बारे में बिना गहराई से सोचे पाकिस्तान से वार्ता तोड़ी. उन्होंने पाकिस्तान के बारे में कड़ी बातें कही, लेकिन इस हफ्ते उन्हें लजाते हुए, एक दुश्मन, नवाज शरीफ से हाथ मिलाना पड़ा. इसके बावजूद कि वार्ता तोड़ने का फैसला उनका (मोदी का) ही था. लेकिन वह मजबूर क्यों हुए? क्योंकि यह होना ही था, जैसा कि कुछ लोगों ने अनुमान लगाया था. चूंकि मोदी की नीति बेमतलब थी. सब कुछ केवल बाहरी दिखावा था. ऐसे समय में खुद को कठोर और कड़क दिखाना, जबकि यह सामथ्र्य के बाहर और अव्यावहारिक था. इस मुंह फुलाने से हम भारतीयों को क्या हासिल हुआ?
न तो भाजपा में कोई और न ही मीडिया में उनके ‘कड़े’ समर्थक इसकी कोई कैफियत पेश कर सकते हैं. (तत्कालीन) रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया कि सीमा पर गोलाबारी में जितने हमारे नागरिक मारे गये, उन्होंने उससे ज्यादा पाकिस्तानी नागरिकों को मार कर पाकिस्तान को सबक सिखा दिया है.
अगर इसे सबक मान लिया जाये, जिससे कि बहुत से भारतीय असहमत होंगे, तो क्या वह गारंटी दे सकते हैं कि गोलाबारी हमेशा के लिए खत्म हो गयी है? यदि वह ऐसा नहीं कर सकते, तो पाकिस्तान से बात नहीं करने की जगह पहले तल्खी बढ़ने देने, फिर मामला शांत करने के लिए काम करने में क्या बुद्धिमानी है?
गरमपंथी विचार रखनेवालों के पास कोई ठोस उपाय पेश करने के लिए नहीं है और यह बात पिछले 20 वर्षो में साफ हो चुकी है. तथ्य यह साबित करते हैं. भारत इतना मजबूत नहीं है कि पाकिस्तान को ताकत से दबा कर अपना रास्ता हमवार कर सके, क्योंकि भाजपा इस उपमहाद्वीप को नाभिकीय युद्धभूमि बना चुकी है. भारत कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से इनकार करता है, और, कम से कम इस क्षण, भारत पाकिस्तान से बात नहीं करेगा. यह स्थिति बदलेगी और यह काम भारत को ही करना होगा और गरमपंथी समूह को झुकना पड़ेगा.’
भाजपा अब झुक गयी है. कोई गलती नहीं करें, और एमजे अकबर के परदा डालनेवाले खोखले शब्दों की अनदेखी करें. पाकिस्तान ने एक भी चीज नहीं बदली है. यह भाजपा और उसके उन्मादी समर्थक हैं, जो बदले हैं. और यह बहुत अच्छी बात है.
(अनुवाद : सत्य प्रकाश चौधरी)

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